नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १२५ ) विट—यदि तू ब्राह्मण है तो तेरा यज्ञोपवीत कहाँ है ? विदूषक—(अपने शरीर पर यज्ञोपवीत न देखकर) उस मेरे यज्ञोपवीत को इस चेट ने खींचते हुए तोड़ डाला है । चेटी—(हँसते हुए) यदि ऐसा ही है तो कुछ वेद के मन्त्र ही बोल । विदूषक— भद्रे ! इस शराब की बू से मेरे वेद मन्त्र भी बन्द हो गए हैं । अथवा, आप के साथ विवाद करने से मुझे क्या लाभ ? (लो) यह ब्राह्मण आप के पैरों पड़ता है । [यह कह कर उसके पैरों पर गिरना चाहता है] चेटी—(हाथो से रोक कर)— आर्य ! ऐसा मत करें । शेखरक ! हटो, हटो ! यह सचमुच ब्राह्मण ही है । (विदूषक के पैरों पर गिरती है) आर्य, आप नाराज़ न हों । सम्बन्धी के अनुरूप ही मैं ने ऐसा मज़ाक किया है ।
- बन्द हो गए हैं; मानों उन पर पर्दा पड़ गया है; मैं भूल गया हूँ । वस्तुतः उसे कोई वेद मन्त्र याद नहीं । शराब की बू का तो केवल बहाना ही है । इसी लिए अगले ही वाक्य में हथियार डाल देता है ।