भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 309 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 159

An exact line-by-line transcription of the page into Devanagari script:

( १२७ ) विट- मैं भी इन को मनाता हूँ। (पैरों पर गिरकर) क्षमा करें आर्य ! जो कुछ मैं ने नशे के जोश में अपराध किया है उसे आप क्षमा करें ताकि मैं नवमालिका के साथ मधुशाला को जाऊं । विदूषक-मैं ने, क्षमा किया। आप दोनों जाइए। मैं भी अपने प्रिय मित्र को देखता हूँ। [चेट्टी के साथ विट और चेट का प्रस्थान] विदूषक- (सुफ) ब्राह्मण की अकाल मृत्यु टल गई। तो मैं शराबी के सम्पर्क से दूषित हुआ इस तालाब में स्नान करता हूँ। [वैसा ही करता है। (फिर) पर्दे की ओर देखकर] यह मेरा प्रिय मित्र, रुक्मणी को लिए कृष्ण के समान, मलयवती के साथ इधर ही आ रहा है। तो मैं भी इनके पास ही जाता हूँ। [वर वेष में नायक, मलयवती और वैभव के अनुरूप नौकरों का प्रवेश]

  1. आपानकं = पानशाला; भट्टी; मधुशाला; शराब पीने की जगह; शराब की दुकान ।
  2. अवलम्ब्य = सहारा लेकर; हाथ पकड़ कर; उसके सङ्ग ।