नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १२६ ) नायक—(मलयवती को देख कर, हर्षपूर्वक) जब मैं इसे देखता हूँ तो यह अपनी दृष्टि नीचे कर लेती है; यदि मैं बातचीत करता हूँ तो यह बोलती ही नहीं; शय्या पर यह अपना मुख दूसरी ओर किए रहती है; बलात् (ज़बरदस्ती) आलिङ्गन करने पर काँपने लगती हैं; जब इसकी सहेलियां कमरे से जाने लगती हैं तो यह भी मानों निकल जाना चाहती है; इस प्रतिकूल आचरण से मेरी नवविवाहिता प्रिया और भी अधिक आनन्द का कारण बन गई है । (मलयवती को देख कर)— हे प्रिये ! (लोगों की) प्रत्येक बात के उत्तर में केवल हुङ्कार (हूँ, हूँ) करते हुए जो मैं ने मौनव्रत का पालन किया, दावाग्नि के समान गरम चन्द्रमा की किरणों से जो अपने इस शरीर को तपाया, बहुत काल तक रात-दिन एकाग्रचित्त से जो (तेरा ही) ध्यान किया— उसी तपस्या का यह फल है कि तेरा यह मुख अब देख रहा हूँ । नायिका—(अलग) सखी चतुरिका ! यह केवल सुन्दर ही नहीं, अपितु
- वासभवनं = रहने की जगह; घर; अथवा कमरा; शयनगृह ।
- वामता = विरुद्ध आचरण; इच्छा के प्रतिकूल आचरण ।