नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४७ ) विदूषक - (वैसा ही करता है) चेटी - (मन ही मन) जब तक यह आँखें बन्द किए ठहरा है तब तक नीले रस के समान तमाल पत्र के रस से इस का मुंह काला करती हूँ। [उठ कर तमाल पत्र को लेने तथा उसे निचोड़ने का अभिनय करती है। नायक तथा नायिका विदूषक को देखते हैं] नायक - मित्र ! तुम सचमुच धन्य हो जो हमारे रहते हुए भी तुम्हारा (ही) इस तरह से वर्णन किया जा रहा है। (तुम रंगे जा रहे हो)। [चेटी तमाल रस से विदूषक के मुख को काला कर देती है] नायिका - (मुस्कराते हुए विदूषक को देख कर नायक को देखती है) नायक - (नायिका के मुख को देखकर - हे सुन्दर आंखों वालो ! तुम्हारे होंठ रूपी कोमल पत्तों में यह मुस्कान रूपी फूलों का निकलना दिखाई दे रहा है। परन्तु (इस फूल का) फल तो कहीं और मुझ देखने वाले की आंखों में (हो रहा है)। (अर्थात् तुम्हारी मुस्कान को देखकर मेरी आंखें सफल हो गईं) विदूषक - भद्रे ! तुमने क्या किया ?
- सती सप्तमी ।
- यह साधारण नियम है कि जहां फूल लगता है फल भी वहीं लगता है; परन्तु स्मित रूपी फूल तेरे ओष्ठ रूपी पल्लव पर खिला है, परन्तु सफल (फलयुक्त) मेरी आंखें हो रही हैं। 'फल' पर श्लेष है - (i) फल, अथवा (ii) परिणाम। यहां फल, आंखों को होने वाला आनन्द है।
- पश्यतः = दृश् + शतृ + पु० + षष्ठी एक वचन । 'मम' का विशेषण ।