नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १५३ ) चेटी - सचमुच तुम्हारा वर्णन (रंगन) किया है। विदूषक- (हाथ से मुंह पोंछ कर, हाथ को देखकर; क्रोध से डण्डा उठा कर) अरी दुष्टा ! यह राजकुल है। तुम्हारा क्या करूँ ? (नायक से) आप लोगों के सम्मुख ही इस नीच ने मेरा अपमान किया है। तो मेरे यहाँ ठहरने से क्या लाभ ? वहीं और चला जाता हूँ। (निकल जाता है) चेटी- आर्य आत्रेय मुझ से नाराज़ हो गए ? अतः जाकर उन्हें मनाती हूँ। (जाना चाहती है) नायक - सखी चतुरिका ! क्या मुझे अकेली छोड़ कर जा रही हो ? चेटी- (नायक की ओर देखकर मुस्कराती हुई) ऐसी अकेली (तो) तू चिरकाल तक रह। [यह कह कर प्रस्थान]
- खलीकृत = उल्लू बनाया गया हूँ। इस ने बुरा सलूक किया है।