नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १४७ ) मित्रावसु- जीमूतवाहन के उस शत्रु को मारे बिना मैं निर्लज्ज बन कर (इसे) कैसे कहूँ कि आपका राज्य शत्रु ने हर लिया है ? और इसे यह सूचना दिए बिना जाना भी उचित नहीं, अतः कह कर (ही) जाता हूँ । नायक-(मित्रावसु को देखकर)- मित्रावसु ! इधर बैठिए ! मित्रावसु - (बैठ जाता है) नायक - (अच्छी तरह देखकर) मित्रावसु ! कुछ घबराए हुए से दीखते हो ? मित्रावसु - दुष्ट मतङ्ग के विषय में क्या घबराहट (हो सकती है) ? नायक - (क्यों) मतङ्ग ने क्या किया है ? मित्रावसु-अपने नाश के लिए उसने आप के राज्य को हड़प लिया है । नायक - (प्रसन्नता पूर्वक, मन ही मन) काश कि यह सच हो ! मित्रावसु- अतः उसके विनाश के लिए कुमार आज्ञा दें । अधिक क्या ?-- १. क्रुद्ध; जोश में; आवेश में; घबराए हुए । २. 'हतक' समास के अन्त में आता है। अर्थ है 'दुष्ट', 'नीच' ।