नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १५६ ) नायक (सुनकर) - आपने ठीक देखा है— ज़ोर से गर्जने वाले जलहस्तियों के वेग से (किए गए) सूंड़ों के आघातों से प्रचण्ड, पर्वत की समस्त कन्दराओं को गूँजाता हुआ, कानों को बहरा करता हुआ यह शब्द जैसे ऊँचे स्वर में उठ रहा है उस से (जान पड़ता है) कि बहुत उछलते हुए असंख्य शंखों को धारण करने वाली यह समुद्रवेला (जल की बाढ़। आ रही है। मित्रावसु—यह तो सचमुच आ ही गई। देखिए— लवङ्ग (लौंग) के कोमल पत्तों को खाने वाले जलहस्तियों तथा मगरमछों के उद्गार से सुगन्धित जल के साथ, रत्नों की प्रभां से देदीप्यमान यह समुद्रवेला (बाढ़) सुशोभित है। अतः आइए पानी के फैलने के इस मार्ग से हट कर इस पहाड़ की चोटी के पास वाले रास्ते से चलें। नायक - मित्रावसु ! देखों, देखो; शरत्काल के श्वेत बादलों के समूह से ढकी हुई मलय पर्वत की चोटियां हिमालय की चोटियों की शोभा को धारण कर रही हैं। मित्रावसु — यह मलय पर्वत की चोटियां नहीं हैं। ये तो सांपों की हड्डियों के ढेर हैं।
- प्रायः = सम्भवतः ; शायद । अथवा, बहुत. - 'प्रेङ्खत्' का क्रिया- विशेषण ।
- वेला = जल की बाढ़ । ज्वार भाटा ।
- कवलित = खाए हुए ।
- उद्गार = वमन । जो मुहँ से निकाला जाए। अथवा, श्वास, सांस ।
- प्रालेय = हिम; बर्फ़ । प्रालेयाचल = हिमाचल, हिमालय ।
- सङ्घात = समूह; इकट्ठ ।