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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 189

( १६१ ) नायक — (उद्वेग पूर्वक) आह ! बड़े दुःख की बात है। किस कारण इन की एक साथ मृत्यु हुई है ? मित्रावसु — कुमार ! यह एक साथ नहीं मरे। सुनिए, यह जैसे (हुआ) । प्राचीनकाल में, अपने पंखों की वायु से समुद्र के सम्पूर्ण जल को हटा कर, गरुड़ वेग के साथ पाताल से सांपों को निकाल कर प्रतिदिन खाया करता था। नायक— (उद्वेग पूर्वक) हाय ! बहुत बुरा किया ! तो, फिर ? मित्रावसु — तब सब सांपों के नाश की शङ्का करने वाले वासुकि ने गरुड़ से कहा— नायक — (आदर पूर्वक)— कि "(इन से) पहिले मुझे खाओ ?" मित्रावसु — नहीं, नहीं । नायक — और क्या (कहा) ? मित्रावसु— यह कहा कि हे गरुड़) ! आप की झपट के डर से हज़ारों नागस्त्रियों के गर्भ गिर जाते हैं और बच्चे मर जाते हैं। इस प्रकार हमारी सन्तान के नाश से आप के ही स्वार्थ की हानि होगी । (अतः) जिस लिए आप नागलोक पर आक्रमण करते हैं उस (उद्देश्य की पूर्ति) के लिए यहीं एक एक सांप प्रति दिन मैं भेज दिया करूँगा ।" नायक — आह ! इस प्रकार वासुकि ने सांपों की रक्षा की ?

  1. शङ्क=शक, डर, भय । 2.आदर=उत्कंठा के अर्थ में ।
  2. अभिसम्पात=आक्रमण, झपटा; किसी पर टूट पड़ना; ऊपर से ज़ोर से गिरना । 4. भुजगः भुजंगः, भुजंगमः तीनों का एक ही अर्थ है । इसी प्रकार तुरगः, तुरंगाः तुरंगमः का ।
  3. जिन पांच तत्वों से शरीर बना है, उन्हीं में मिल जाना, अर्थात् मर जाना ।