नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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क्या उस की दो हज़ार जिह्वाओं मे से एक भी जिह्वा ऐसी न थी जिस से वह कह सकता कि 'एक सांप की रक्षा के लिए मैं अपने आप को गरुड़ के हवाले करता हूँ'? मित्रावसु— गरुड़ ने इसे स्वीकार कर लिया।— इस प्रकार वासुकि से व्यवस्था करके यह पक्षिराज गरुड़ जिन बड़े बड़े सांपों को खाता रहा है उन के— बर्फ़ के पहाड़ की शोभा को धारण करने वाले — ये हड्डियों के ढेर दिन प्रति दिन वृद्धि को प्राप्त हुए हैं, हो रहे हैं और होते रहेंगे। नायक —कितने आश्चर्य की बात है !!! सब अपवित्रताओं के घर, कृतघ्न और नाशवान् इस निकम्मे शरीर के लिए भी मूर्ख लोग पाप कमाते हैं ! आह ! दुःख की
- द्वितय = जोड़ा। जिह्वाओं के हज़ार जोड़े। सांप की जिह्वा बीच में से कटी होने के कारण दो जिह्वाएँ गिनी जाती हैं।
- व्यवस्था = इन्तज़ाम, प्रबन्ध, फ़ैसला; समझौता।
- शरीर को कृतघ्न इस लिए कहा है कि चाहे कितना ही सेवा करके बना कर उसे रखा जाए, फिर भी एक न एक दिन वह हमें धोखा देकर छोड़ जाता है।
- "क" अकिञ्चन, नाचीज़, निकम्मा के अर्थ में लगा है। 'क' घृणा अथवा निन्दा के योग में।