भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 197

( १७१ ) इस वृक्ष के पीछे छिप कर सुनता हूँ। [वैसा ही करता है] सेवक— (आँसुओं के साथ, हाथ जोड़ कर) कुमार शङ्खचूड़ ! यह स्वामी की आज्ञा है इसी लिए आप से यह कठोर वचन कह रहा हूँ ! शङ्खचूड़— आर्य, कहिए । सेवक— नागों के राजा वासुकि ने आज्ञा दी है कि— शङ्खचूड़— (सिर पर हाथ जोड़ कर, आदर पूर्वक) महाराज ने क्या आज्ञा दी है ? सेवक— "यह दोनों लाल वस्त्र पहिन कर वध्यशिला पर चढ़ जाओ जिससे लाल वस्त्र को पहिचान कर गरुड़ तुम्हें खा लेगा।" नायक — (सुनकर) क्या वासुकि ने इसे त्याग दिया ? सेवक— कुमार ! लो यह दोनों वस्त्र । [यह कह कर देता है] शङ्खचूड़— (आदर पूर्वक) लाओ । (लेकर) स्वामी की आज्ञा सिर माथे पर (शिरोधार्य है) । वृद्धा — [पुत्र के हाथ में दोनों (लाल) वस्त्र देखकर, छाती पीटती हुई]— हाय, बच्चे ! यह तो (मुझे) वज्रपात के समान मालूम पड़ता है । [मूर्च्छित हो जाती है]

  1. देखकर, पहिचान कर ।