नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( १७५ ) जिन अत्यन्त दयालु पुरुषों ने याचकों की प्रार्थना को कभी निष्फल नहीं जाने दिया, जिन्होंने करुणा को ग्रहण करने के कारण परोपकार के आगे स्वार्थ को कुछ नहीं गिना, जो दूसरों के दुःख से दुःखी होते थे वे सज्जन लोग अस्त हो गए (मर गए) । (अतः) माता जी ! अब अपने आंसुओं के वेग को रोको । किस के आगे रो रही हो ? अतः धीरज धरो । वृद्धा — (आंसुओं के साथ) कैसे धीरज धरूँ ? क्या तुम इकलौते बेटे हो इसी लिए कृपालु नागराज ने तुम्हें (बलि के लिए) भेजा है ? हाय, समग्र जीवलोक के रहते हुए मेरा पुत्र ही क्यों याद किया गया ? मैं सब प्रकार से अभागिन हूँ । [मूर्च्छित हो जाती है] नायक—(दया पूर्वक) यदि मैं बन्धुओं से छोड़े गए, कंठगत प्राण वाले इस दुःखी को नहीं बचाता तो मेरे शरीर का क्या लाभ ?
- अविच्छिन्न = अखण्डित । जिस का कुछ नहीं बिगड़ा । जो लगातार कायम है । अतः सम्पूर्ण, समग्र ।
- जिस के प्राण गले तक आ गए हैं । मृतप्राय । जो अभी मरने वाला है ।
- त्राये = त्रै (भ्वादिगण आत्मने पद) + लट् + उत्तमपुरुष + एक वचन । (बचाना) -बचाता हूँ ।