भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( १८१ )

वृा— (दोनों कान बन्द करके) अमंगल नष्ट हो ! तुम भी शङ्खचूड़ के समान ही पुत्र हो। अथवा, शङ्खचूड़ से भी बढ़ कर जो इस प्रकार बान्धवों से त्यागे गए भी मेरे पुत्र को अपना शरीर दे कर बचाना चाहते हों। शङ्खचूड़— अहो ! इस महात्मा का चरित्र संसार से विपरीत है : क्योंकि— जिन (प्राणों) के लिए विश्वामित्र ने प्राचीन काल में चाण्डाल की तरह कुत्ते का मांस खाया था, जिन (प्राणों) के लिए गौतम ने अपने उपकारी नाड़ीजंघ को मार डाला था, जिन के लिए कश्यप का यह पुत्र तार्क्ष्य (गरुड़) प्रति दिन सांपों को (मार कर) खा जाता है, उन्हीं प्राणों को जो यह सज्जन पुरुष दया से दूसरे के लिए तृण की तरह दे रहा है। (नायक से) हे महात्मन् ! आप ने अपने शरीर के अर्पण करने के निश्चय से मेरे प्रति निष्कपट दया दिखा दी। अतः इस आग्रह को रहने दीजिए। देखिए—


१. निर्विशेष = अभिन्न; सदृश । २. श्वपचः = चांडाल, शूद्र। ३. मारा गया था। ह। कैचाहट । पुरुष + एक