नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६१ ) प्रलयकाल के मेघों के समान पँखों की कतारें (समूह) आकाश को ढक रही हैं। वेग से चलने वाली हवा मानों पृथ्वी को (ही) डुबा देने के लिए समुद्र का पानी तट पर फेंक रही है। और झटपट प्रलयकाल की शङ्का उत्पन्न करता हुआ, दिशाओं से डर के साथ देखा गया, बारह सूर्यों की कान्ति वाला (यह गरुड़) अपने शरीर की प्रभा से दसों दिशाओं को बार बार कपिश (लाल भूरा) सा कर रहा है। अतः जब तक यह शङ्खचूड़ आ नहीं जाता तब तक जल्दी से इस वध्यशिला पर चढ़ता हूँ। [वैसा ही करके, बैठकर, उस के स्पर्श का अभिनय करता है]– आह ! इस का स्पर्श (कैसा अच्छा है) ! मैं मानता हूँ कि मलयचन्दन के रस से सिक्त (शीतलाङ्गी) मलयवती भी आलिङ्गन की गई मुझे इतना सुख नहीं देती जितना कि अभीष्ट अर्थ की सिद्धि के लिए स्पर्श की गई यह वध्यशिला (देती है)। अथवा, मलयवती से क्या ? (उस की बात छोड़ो)–
१. प्रलयकाल के समय प्रकट होने वाले बादल । २. 'सुखयति' और "आश्लिष्टा"–मलयवती तथा शिला–दोनों के साथ लगते हैं।