नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( १६३ ) बचपन से माता का गोद में निःशङ्क सोने से भी मुझे वह सुख प्राप्त नहीं हुआ था जो (सुख) इस वध्यशिला की गोद में मिला है । तो यह गरुड़ आ गया । अतः अपने शरीर को (इन लाल वस्त्रों से) ढकता हूँ । [वैसा ही करता है] [गरुड़ का प्रवेश] गरुड़ — चन्द्रमण्डल को हिलाता-डुलाता हुआ, भय से कुण्डलिनी मारे शेषनाग की मूर्ति को याद करता हुआ, रथ के घोड़ों के डर से सूर्य के विचलित होने पर अपने बड़े भाई (अरुण) के द्वारा आनन्द पूर्वक देखा गया, किनारों पर लिपटे हुए बादलों के समूह से अत्यन्त विस्तृत हुए पँखों वाला यह मैं साँपों को खाने की इच्छा वाला क्षण में वहां (समुद्र के) किनारे पर विद्यमान मलयपर्वत पर पहुँच गया हूँ । नायक — (सन्तोषपूर्वक) आज अपने शरीर के दान से नाग की रक्षा करते हुए मैं ने जो पुण्य प्राप्त किया है उससे प्रत्येक जन्म में मुझे इसी प्रकार ही परोपकार के लिए शरीर लाभ हो ।
- भय अथवा शङ्का से रहित हो कर—; क्रियाविशेषण ।
- सति सप्तमि — सूर्य के विचलित होने पर !
- भव = जन्म ।