नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपाँचवां अङ्क। [ प्रतीहार (द्वारपाल) का प्रवेश ] प्रतीहार — प्रिय जन के अपने घर के बग़ीचे में जाने पर भी, प्रेम के कारण, अनिष्ट की आशङ्का होने लगती है; (फिर) वन के बीच जाने पर तो कहना ही क्या जहां बहुत से विघ्न और डर देखे गए हों। वैसे ही, समुद्रतट को देखने की उत्कण्ठा से गया हुआ जीमूतवाहन देर कर रहा है इस विचार से महाराज विश्वावसु दुःखी हो रहे हैं। और उन्होंने मुझे आज्ञा दी है कि 'हे सुनन्द ! मैंने सुना है कि दामाद जीमूतवाहन उस स्थान को गए हैं जहां गरुड़ का डर हमेशा बना रहता है। इस समाचार से मुझे आशङ्का हो रही है। अतः तुम जल्दी से पता लगा कर आओ कि वह अपने घर (लौट) आए हैं कि नहीं। तो मैं वहां जाता हूँ। (घूमते हुए, आगे देख कर) यह जीमूतवाहन के पिता राजर्षि जीमूतकेतु कुटिया के आंगन में अपनी पत्नी तथा पुत्रवधू राजकुमारी (मलयवती) से सेवा किए जा रहे हुए बैठे हैं। और भी —
- 'अति स्नेहः पापशङ्की' —शकुन्तला ।
- सन्निहित —समीप स्थित। सदा उपस्थित। ( ५६६ )