नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(२०१) तह वाले, तरंग की तरह लहराते हुए, झाग वाले पानी की तरह सफेद, दो रेशमी वस्त्र-धारण किए हुए, जल जन्तुओं से युक्त अति पुण्यवती गङ्गा के समान अपनी समान-अवस्था वाली पुण्याह्ला महारानी के साथ शोभायमान, यह जीमूतकेतु समुद्र की लक्ष्मी के समान शोभा को धारण कर रह रहा है जिस के समीप बैठी हुई यह मलयवती मलयपर्वत से युक्त समुद्रतट के समान लग रही है। तो मै समीप जाता हूँ। [ पत्नी तथा पुत्रवधू के साथ जीमूतकेतु का प्रवेश ] जीमूतकेतु- मैने यौवन के सुख भोग लिए, यश भी फैल गया है, स्थिर बुद्धि से राज्य कर लिया, तप भी किया, पुत्र श्लाघा योग्य है, यह बहू भी अपने समान कुल में उत्पन्न हुई है, अब तो निश्चय ही कृतकृत्य हुए मुझे मृत्यु की (ही) चिन्ता करनी चाहिए। सुनन्द- (अचानक पास जा कर) - जीमूतवाहन की...... जीमूतकेतु- (कान बन्द करके) अनिष्ट नाश हो, अनिष्ट नाश हो ! १. भङ्ग = तह अथवा लहर । २. सवयसा = हम-उम्र, समान आयु वाली; अथवा, पक्षियों, हंसों या जल-जन्तुओं से युक्त । ३. राज्ये स्थितम् = राज्य में ठहरा । राज्य किया । ४. मानों जीमूतकेतु के अन्तिम वाक्य को इस प्रकार से समाप्त किया है कि 'अब मुझे जीमूतवाहन की मृत्यु की चिन्ता करनी चाहिए' जो कि अनिष्टसूचक है, अपशकुन है । पताकास्थान ।