नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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(२०३) वृद्धा— यह अमंगल नष्ट हो ! ! मलयवती— इस अपशकुन से मेरा दिल कांप रहा है। जीमूतकेतु— (बाईं आँख का फड़कना सूचित करके)— भले आदमी, जीमूतवाहन की क्या ? सुनन्द — जीमूतवाहन की कुशलवार्ता जानने के लिए महाराज विश्वावसु ने मुझे आप के पास भेजा है। जीमूतकेतु— क्या मेरा बच्चा वहाँ नहीं है ? वृद्धा— (दुःखपूर्वक) महाराज ! यदि मेरा बच्चा वहां नहीं है तो कहाँ गया होगा ? जीमूतकेतु— अवश्य ही हमारे लिए भोजन सामग्री लाने के लिए बहुत दूर चला गया होगा । मलयवती— (दुःख पूर्वक, मन ही मन) — आर्यपुत्र को न देखती हुई मुझे तो कुछ और ही आशंका हो रही है। सुनन्द— महाराज आज्ञा दें मैं स्वामी को क्या कहूँ ?
- जो समीप नहीं; अनुपस्थित ।
- हमारे प्राण धारण करने के लिए । खाने के लिए (सामग्री लाने के लिए)।