नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
पृष्ठ 229, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ें( २०५ ) जीमूतकेतु—(बाईं आंख का फड़कना सूचित करके) —जीमूतवाहन देर कर रहा है, इस विचार से मैं मन में व्याकुल हो रहा हूँ।— हे दुष्ट बाईं आंख ! बार बार मेरे अनिष्ट की सूचना देती हुई तू क्यों फड़क रही है ? तेरा फड़कना दूर हो ! (और) मेरा बच्चा सकुशल हो !! (ऊपर देखकर) यही त्रिलोकी के नेत्रस्वरूप, सहस्र किरणों वाले भगवान् सूर्य अवश्य ही जीमूतवाहन का कल्याण करेंगे । (देखकर, विस्मयपूर्वक)— देखने से आंखों को अति दुःख देने वाला, अपनी किरणों की शोभा के समान खून की धाराएँ टपकाता हुआ, उत्पातकारी वायु से हिलाए गए तारे की कान्ति वाला यह आकाश से (हमारे) सामने एकाएक क्या गिर रहा है ? क्या, (मेरे) चरणों पर ही गिर पड़ा ? (सब हैरानी से देखते हैं) जीमूतकेतु — अरे ! (यह तो) खून से गीले माँस तथा बालों से लिपटा हुआ चूड़ामणि है । यह किस का हो सकता है ?
- जो रस की धाराएँ बहा रही है जी उसकी किरणों के समान लग रही हैं ।
- सरस=रस वाला; गीला; ताज़ा । (जिस के साथ ख़ून से युक्त माँस लगा हुआ है)