नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( २०७ ) वृद्धा - (दुःख पूर्वक) महाराज ! यह तो मानों मेरे बच्चे का ही चूडामणि है। मलयवती— माता जी ! ऐसा न कहो। सुनन्द — महाराज ! इस प्रकार जाने बिना ही व्याकुल न हों। यहां तो— गरुड के द्वारा खाए जाते हुए सांपों के यह ऐसे उल्कारूप चूडामणि अनेकों ही गिरा करते हैं। जीमूतकेतु — देवि ! सुनन्द ने युक्ति-युक्त बात कही है। शायद ऐसा ही हो ! वृद्धा — हे सुनन्द ! कदाचित् मेरा पुत्र इस समय तक श्वशुरगृहमें ही आ गया है ! अतः जाओ पता लगा कर शीघ्र सूचना दो। सुनन्द — महारानी की जो आज्ञा। [प्रस्थान] जीतमूतकेतु — देवि ! कदाचित् यह किसी सांप का ही चूडामणि हो ।
- भक्ष् + कर्मवाच्य + शानच् + पु० + षष्ठी, बहुवचन ।
- अनेकशः = अनेकों; अनेक बार; प्रायः ।
- सोपपत्तिकं = युक्ति के साथ ।
- सम्पादय = प्राप्त कर । (मेरे लिए) पता लगा । मुझे समाचार ला दे । सूचना दे ।