नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २०६ ) [लाल वस्त्र पहने शङ्खचूड का प्रवेश] शङ्खचूड— (आंसुओं के साथ)— आज, बड़े कष्ट की बात है ! भाग्य द्वारा, ठगा गया हूँ। समुद्र के किनारे (पर विराजमान) भगवान् गोकर्ण को प्रणाम करके मैं शीघ्र ही उसी साँपों की वध्यभूमि पर पहुंच गया हूँ। (परन्तु इसी बीच में) अपने नाखून तथा चोंच से विदीर्ण छाती वाले उस विद्याधर को लेकर गरुड आकाश में उड़ गया है । (रोते हुए)— हा महात्मन् ! हा अत्यन्त दयालु ! हा बिना कारण के बन्धु ! हा दूसरों के दुःख से दुःखी होने वाले ! तुम कहां चले गए ! मुझे उत्तर दो । (अपने आप से) आह पापी शङ्खचूड ! तू ने क्या किया ? — न तो मैंने किसी सर्प को बचाकर कोई कीर्ति ही प्राप्त की, और न ही अपने स्वामी की श्लाघा-योग्य आज्ञा का ही पालन किया । (वरन्) किसी दूसरे ने अपने प्राण देकर मुझे बचाया; (अतः) मैं शोचनीय हूँ । आह, धिक्कार है ! बड़े दुःख की बात है कि मैं ठगा गया, ठगा ही गया, अतः ऐसा मैं एक क्षण
- नखमुख = नाखून का अग्रभाग । अथवा, नाखून और चोंच से (विदीर्ण) ।
- एका = एक; थोड़ी भी; छुक भी ।