भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

( २२१ ) जीमूतकेतु—वत्स, तुम्हारी यह वाणी सत्य हो ! फिर भी अग्नि के साथ ही हमारा अनुसरण करना उचित होगा। अतः आप (उसका) अनुसरण करें। हम भी अग्निशाला से अग्नि लेकर शीघ्र ही पीछे पीछे आते हैं। [पत्नी तथा बहू के साथ प्रस्थान] शङ्खचूड़— तब मैं गरुड़ का अनुसरण करता हूँ। (घूमकर, आगे देख कर)— रक्त से गीली अपनी चोंच के रगड़ने से पर्वत की तलहटियों को नावों की तरह (बीच में से गहरी) करता हुआ अपनी आँखों की ज्योति की ज्वालाओं से समीप के वन के मध्यभाग को जलाता हुआ, (मलयभूमि में) घुसने वाले वज्र के समान कठोर भीषण नखों की नोकों से भूमि को खोदता हुआ, यह साँपों का शत्रु (गरुड़) मलयपर्वत की चोटी पर (बैठा हुआ) दूर से (ही) दिखाई दे रहा है। [सामने पड़े हुए नायक के साथ आसन जमाए गरुड़ का प्रवेश] गरुड़ – (मन ही मन) जन्म से नागराजों को खाते हुए मैंने कभी पहिले ऐसा आश्चर्य नहीं देखा। क्योंकि यह महासत्त्व (महात्मा) केवल व्यथा रहित ही नहीं, अपितु कुछ कुछ प्रसन्न सा दिखाई देता है— । क्योंकि:—

  1. कृ + शानच् + प्रथमा एक वचन।