नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २२६ ) छाती पर के स्वस्तिक चिह्न को रहने दो; (किन्तु) मेरे शरीर पर की केंचुली (भी क्या आप को) दिखाई नहीं देती ? मेरे बोलते हुए की दो जिह्वाओं को भी आपने नहीं गिना ? भयानक विष की अग्नि के धुँए के समूह से जिन के रत्नों की चमक मलीन हो गई है और जो दुःसह शोक के कारण सू सू कर के निकलती हुई हवा से फैल रहे हैं ऐसे मेरे इन तीन फणों को भी क्या आप नहीं देख रहे ? गरुड़- (दोनों को अच्छी तरह देखकर, शङ्खचूड़ के फण को देखकर) तो यह कौन मेरे द्वारा मारा गया है ? शङ्खचूड़- विद्याधरों के वंश का तिलक जीमूतवाहन । निर्दय हो कर तुम ने ऐसा क्यों किया ? गरुड़- (मन ही मन) अरे, क्या यह वही विद्याधर कुमार जीमूतवाहन है जिस का यश मेरु पर्वत पर, मन्दराचल की कन्दराओं में, हिमालय के उन्नत प्रदेशों में महेन्द्र पर्वत पर, कैलाश पर्वत की चट्टानों पर, मलय पर्वत की चोटियों पर तथा दिशाओं की कुक्षों में लोकालोक पर्वत पर विचरण करने वाले चारणों से गाया जाता हुआ मैं ने बहुत बार सुना है।
- जल्प + शतृ + पु० + षष्ठी एक वचन ।
- सचमुच; शायद; सम्भवतः; कदाचित् ।
- मलीन; धुंदली। 4. चमक; कान्ति ।
- श्रेष्ठ; शिरोमणि । 6. प्राग्भार = चोटी, शिखर ।
- विभिन्न दिशाओं की कन्दराओं अथवा लताभवनों में ।