नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३१ ) मैं तो सब प्रकार से महान पाप के पङ्क में डूब गया हूँ । नायक- हे नागराज (शङ्खचूड़) ! तुम ऐसे घबराए हुए क्यों हो ? शङ्खचूड़ - क्या यह घबराने का कारण नहीं ? अपना शरीर देकर गरुड़ से मेरे इस शरीर की रक्षा करते हुए मुझे पाताल से भी नीचे (नरक में) ले जाना क्या आप के लिए उचित था ? गरुड़ - अरे, दया से आर्द्र चित्त वाले इस महात्मा ने हमारे आहारार्थ आए हुए इस नाग के प्राणों की रक्षा करने के लिए अपने शरीर को (मेरे) खाने के लिए अर्पित कर दिया। तब तो यह मैंने बड़ा अनर्थ किया है। अधिक क्या, यह तो बोधिसत्त्व को ही मार डाला है। इस महान पाप का प्रायश्चित्त अग्नि में जलकर मरने के सिवाय कोई और दूसरा नहीं देख रहा हूँ । तो अग्नि कहाँ पाऊँ ? (चारों ओर देख कर) अरे, यह कुछ लोग आग लिए हुए इधर ही आ रहे हैं। तब तक इन की प्रतीक्षा करता हूँ । शङ्खचूड़- कुमार ! आप के माता पिता आगए । नायक- (घबराहट के साथ) शङ्खचूड़ ! तुम मेरे पास बैठ कर इस चादर से मेरे शरीर को ढक कर मुझे पकड़े रहो । नहीं तो कहीं सहसा ही मुझे इस दशा में देख कर मेरे माता पिता अपने प्राण ही छोड़ दें ।
- अस्थानम् = अनुचित स्थान; अकारण; अनुचित ।
- अकृत्यम् = बुरा काम; पाप; अनिष्ट ।
- ,ऋते' के योग में पञ्चमी आती है । अर्थ = बिना, अतिरिक्त ।
- जहाताम् = हा + विधिलिङ् + प्रथम पुरुष + द्विवचन । 'छोड़ें' ।