नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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[शङ्खचूड़ पास ही में पड़ी हुई चादर ले कर वैसे ही करता है] [पत्नी और पुत्रवधू के साथ जीमूतकेतु का प्रवेश] जीमूतकेतु - (आंसुओं के साथ) हाय पुत्र जीमूतवाहन ! यह सच है कि कृपा करते हुए यह विचार नहीं किया जाता कि यह अपना है और यह पराया है। परन्तु तुम्हें यह विचार क्यों नहीं हुआ कि बहुतों की रक्षा करूँ अथवा एक की । क्योंकि गरुड़ से सांप को बचाने के लिए तुमने अपने प्राणों का त्याग करके अपने आप को, माता पिता को, अपनी बहू को, इस प्रकार इस समस्त कुल को (ही) नष्ट कर दिया है । वृद्धा - (मलयवती से) बेटी ! थोड़ी देर ठहर । लगातार गिरते हुए तेरे आंसुओं की बून्दों से यह अग्नि बुझी जा रही है । [सब घूमते हैं] जीमूतकेतु - हाय, पुत्र जीमूतवाहन ! गरुड़ - (सुनकर) यह तो "हाय पुत्र जीमूतवाहन !" ऐसा कह रहा है । अतः स्पष्ट ही यह इस का पिता होगा । तो क्या मैं इस की अग्नि से अपने आप को जलाऊँ ? इस के पुत्र को मारने के कारण लज्जा से मैं अपना मुंह नहीं दिखा सकता। अथवा,
- रघुवंश - "अल्पस्य हेतोर्बहु हातुमिच्छन्विचारमूढ़ः प्रतिभासि मे त्वम् ।"