नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३५ ) अग्नि के लिए मैं इतना व्याकुल क्यों होता हूँ ? मैं तो समुद्र के पास ही हूं। अतः इस समय— त्रिलोकी को ग्रास करने के आनन्द से चलने वाली काल की जिह्वा के अग्रभाग के समान फैलने वाली अपनी ज्वाला की लहरों से सातों समुद्रों को घी की बूँद की तरह भस्म करने में समर्थ, (तथा) प्रलयकाल की हवा के प्रसार से भी अधिक वेगवान अपने पंखों की हवा से संदीप्त, (और) प्रलयकाल की अग्नि की भांति भयंकर इस वडवाग्नि में (ही मैं) गिर जाऊँगा। [यह कह कर उठना चाहता है] नायक—हे पक्षिराज ! ऐसा प्रयत्न मत करो। (इस निश्चय को रहने दो)। इस पाप का यह प्रायश्चित्त नहीं। गरुड़— (घुटने के बल बैठ कर, हाथ जोड़ कर) हे महात्मा ! तो फिर क्या है, कहिए। नायक — क्षण भर इन्तज़ार करो। मेरे माता पिता आगए हैं। इन्हें (पहिले) प्रणाम कर लूँ। गरुड— ऐसा ही कीजिए। जीमूतकेतु — (देखकर, हर्षपूर्वक) हे देवी, बड़ी प्रसन्नता की बात है। तुम्हें बधाई हो। यह पुत्र जीमूतवाहन केवल जीवित ही नहीं है अपितु सामने ही शिष्य के समान हाथ जोड़े हुए गरुड के द्वारा सेवा किया जा रहा है।
- ज्वालाओं की लहरों से; अर्थात् लहरों के समान एक पर एक आने वाली ज्वालाओं से। 2. ईशे = समर्थे।
- कार्य, निश्चय, प्रयत्न। 4 सेवित सम्मानित पूजित। परि + उप + आस् + कर्मणि + शानच्।