नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २३७ ) वृद्धा — महाराज, मैं कृतार्थ हो गई। जो मैं ने स्वस्थ शरीर वाले पुत्र का मुख देख लिया। मलयवती — मैं आर्यपुत्र को देखती हुई भी, इसे असम्भव जान कर, विश्वास नहीं कर रही। जीमूतकेतु — (पास जा कर) आओ, पुत्र, आओ। मुझे आलिङ्गन करो। [नायक उठना चाहता है; परन्तु चादर गिर जाती है और वह अचेत हो जाता है] शङ्खचूड — होश में आओ, कुमार होश में आओ। जीमूतकेतु — हाय पुत्र, क्या मुझे देखकर भी छोड़ कर चले गए हो ? वृद्धा — हाय पुत्र, क्या केवल वचन से भी तुमने मेरा सम्मान नहीं किया। मलयवती — हाय नाथ, क्या आप ने गुरुजनों का भी ध्यान नहीं करना था ? [सब मूर्च्छित हो जाते हैं] शङ्खचूड — हाय रे अभागे शङ्खचूड ! तू गर्भ में ही क्यों नहीं मर गया। जो इस प्रकार प्रतिक्षण मरण से भी अधिक दुःख अनुभव कर रहा है। गरुड — यह सब मुझ पापी के बिना विचारे काम करने का फल है। तो ऐसा करता हूँ। (पंखों से हवा करता हुआ) हे महात्मन्, १. हतक = अभागा; नीच; घातक। २. नृशंस = क्रूर; पापी। ३. प्रकट होना; फल।