नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( २४१ ) अमंगल नष्ट हो ! ! जीमूतकेतु — (आंसुओं के साथ, मन ही मन) शेष सब अङ्गों के नष्ट हो जाने के कारण मानों आश्रय हीन हो कर गले में आए हुए प्राणों को छोड़ते हुए (अपने) पुत्र को देख कर मुझ पापी के हज़ार टुकड़े क्यों नहीं हो जाते ? मलयवती — हाय प्राणनाथ ! मैं बड़ी कठोर हृदया हूँ जो आप को इस दशा में देखती हुई भी प्राण नहीं छोड़ती। वृद्धा — (नायक के अङ्गों को छूती हुई, गरुड़ के प्रति) अरे निर्दय ! नए रूप तथा यौवन से शोभायमान मेरे पुत्र के शरीर को तू ने अब इस दशा में कैसे कर दिया ? नायक — नहीं, माता जी ऐसा मत कहिए ! इसने क्या किया है ? यह शरीर तो वस्तुतः पहिले भी ऐसा ही था। देखिए —
- त्यज्+शतृ+द्वितीय+एक वचन ।
- कठोर कार्य करने वाली; कठोर हृदया ।