भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 271, कुल 309 में से

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पृष्ठ 271

( २४७ ) नायक - खूब, महात्मन्, खूब (कहा) हम (नागों को अभयदान देने का) अनुमोदन करते हैं। सब प्रकार से इस प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहना। (शङ्खचूड़ से) शङ्खचूड़ ! तुम भी अब अपने घर जाओ। [शङ्खचूड़ (लम्बी) सांस लेकर नीचे मुख किए ठहरा रहता है] नायक - (गहरी सांस लेकर, माता को देखते हुए) - तुम्हारे दुःख से दुःखित होने वाली तुम्हारी वह माता तुम्हें गरुड की चोंच से फाड़ा गया समझती हुई दुःखी है (होगी !) वृद्धा - (आँसुओं के साथ) निश्चय ही वह माता धन्य है जो गरुड के मुख में पड़े हुए (होने पर भी) स्वस्थ शरीर (राज़ी ख़ुशी) अपने पुत्र का मुख देखेगी। शङ्खचूड़ - माता जी, यह (तभी) सत्य है यदि कुमार ठीक हो जाएँगे। नायक - (पीड़ा का अभिनय करते हुए) परोपकार साधन से उत्पन्न अमृत समान रस के पान में मग्न रहने के कारण इतना समय मैं ने पीड़ाओं का अनुभव नहीं किया था परन्तु अब ये मर्म छेदिनी पीड़ाएँ मुझे तंग कर रही हैं। [मरने की दशा का अभिनय करता है] जीमूतकेतु - (घबराहट के साथ) हाय पुत्र ! ऐसा क्यों करते हो ?

  1. सोचती हुई; शङ्का करती हुई ।
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