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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

( २४७ ) नायक - खूब, महात्मन्, खूब (कहा) हम (नागों को अभयदान देने का) अनुमोदन करते हैं। सब प्रकार से इस प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहना। (शङ्खचूड़ से) शङ्खचूड़ ! तुम भी अब अपने घर जाओ। [शङ्खचूड़ (लम्बी) सांस लेकर नीचे मुख किए ठहरा रहता है] नायक - (गहरी सांस लेकर, माता को देखते हुए) - तुम्हारे दुःख से दुःखित होने वाली तुम्हारी वह माता तुम्हें गरुड की चोंच से फाड़ा गया समझती हुई दुःखी है (होगी !) वृद्धा - (आँसुओं के साथ) निश्चय ही वह माता धन्य है जो गरुड के मुख में पड़े हुए (होने पर भी) स्वस्थ शरीर (राज़ी ख़ुशी) अपने पुत्र का मुख देखेगी। शङ्खचूड़ - माता जी, यह (तभी) सत्य है यदि कुमार ठीक हो जाएँगे। नायक - (पीड़ा का अभिनय करते हुए) परोपकार साधन से उत्पन्न अमृत समान रस के पान में मग्न रहने के कारण इतना समय मैं ने पीड़ाओं का अनुभव नहीं किया था परन्तु अब ये मर्म छेदिनी पीड़ाएँ मुझे तंग कर रही हैं। [मरने की दशा का अभिनय करता है] जीमूतकेतु - (घबराहट के साथ) हाय पुत्र ! ऐसा क्यों करते हो ?

  1. सोचती हुई; शङ्का करती हुई ।

( २४८ ) वृद्धा— हा ! किं णु क्खु एत्थं वत्तदि ? (सोरस्ताडम्) हा ! किं नु खल्वेवं वर्त्तते ? परित्ताअह परित्ताअह । एसो क्खु मे पुत्तओ विवज्जइ । परित्रायध्वं परित्रायध्वम् । एष खलु मे पुत्रको विपद्यते । मलयवती—हा अज्जउत्त ! परिच्चइडुकामो विअ लक्खीअसि । हा आर्यपुत्र ! परित्यक्तुकाम इव लक्ष्यसे । नायकः— (अञ्जलिं कर्तुमिच्छन्) शङ्खचूड ! समानय मे हस्तौ । शङ्खचूडः— (कुर्वन्) कष्टम् !! अनाथीकृतं जगत् । नायकः— (अर्द्धोन्मीलितचक्षुः पितरौ पश्यन्) तात ! अम्ब ! अयं मे पश्चिमः प्रणामः । यतः— गात्राण्यमूनि न वहन्ति सचेतनत्वं श्रोत्रं स्फुटाक्षरपदां न गिरः शृणोति । कष्टं निमीलितमिदं सहसैव चक्षु- र्हा तात ! यान्ति विवशस्य ममासवोऽमि ॥३०॥ ¹ अथवा किमनेन प्रलपितेन । [“संरक्षता पन्नगमद्य पुण्यम्”—इत्यादि पूर्वोक्तं श्लोकंपठित्वा पतति] श्लोक नं०: ३०, अन्वयः— (मम) अमूनि गात्राणि सचेतनत्वं न वहन्ति । श्रोत्रं स्फुटाक्षर- पदां गिरः न शृणोति । कष्टम्, इदं चक्षुः सहसैव निमीलितम् । हा तात [......] असवः यान्ति ॥

( २४६ ) वृद्धा- हाय, यह ऐसा क्या हो रहा है ? (छाती पीटती हुई) बचाओ बचाओ !. यह मेरा बच्चा मर रहा है। मलयवती - हाय प्राणनाथ ! (हमें) छोड़ने की इच्छा वाले से दीखते हो। नायक- (हाथ जोड़ने की इच्छा करता हुआ) शङ्खचूड ! मेरे हाथों को (एक दूसरे के) समीप कर दो । शङ्खचूड- (वैसा ही करते हुए) हाय, संसार अनाथ कर दिया गया है। नायक- (आधी खुली आंखों से माता पिता को देखते हुए) हे तात ! हे माता जी !! यह मेरा अन्तिम प्रणाम है। क्योंकि- ये अंग चेतनाहीन हो गए हैं। कान साफ़ अक्षर तथा शब्दों वाली वाणी (भी) नहीं सुनता। दुःख की बात है कि यह आँख भी सहसा ही बन्द हो रहा है। हे तात ! बेबस हुए हुए मेरे ये प्राण जा रहे हैं॥ अथवा इस प्रलाप से क्या लाभ? ["संरक्षता पन्नगमेव पुण्यम्" इत्यादि पहिले कहे श्लोक (अंक ४) को पढ़कर गिर पड़ता है]


  1. क्या लाभ ? इस अर्थ में इस के साथ पञ्चमी आती है ।

( २५० ) वृद्धा— हा पुत्त ! हा वच्छ ! हा गुरुअणवच्छल ! कहिं सि ? हा पुत्र ! हा वत्स ! हा-गुरुजनवत्सल ! क्वासि ? देहि मे पडिवअणं । देहि मे प्रतिवचनम्। जीमूतकेतुः— हा वत्स जीमूतवाहन ! हा प्रणयिजनवल्लभ ! हा सर्वगुणनिधे ! क्वासि ? देहि मे प्रतिवचनम्। [हस्तमुत्क्षिप्य]। कष्टं भोः कष्टम् । निराधारं धैर्यं, कमिव शरणं यातु विनयः ? क्षमः क्षान्तिः वोढुं क इह ? विरता दानपरता ? हतं सत्यं सत्यं, व्रजतु कृपणा क्वाद्य करुणा ? जगज्जातं शून्यं त्वयि तनय ! लोकान्तरगते । ३१॥ मलयवती — हा अज्जउत्त ! कहं मं परिच्चइअ गदोसि ? हा आर्यपुत्र ! कथं मां परित्यज्य गतोऽसि ? अदिणिग्घणे मलअवदी ! किं तुए पेक्खिदव्वं ? जा अतिनिर्घृणे मलयवती ! किं त्वया प्रेक्षितव्यम् ? या एत्तिअं वेलं जीविआसि ! एतावतीं वेलां जीवितासि ! श्लोक नं०: ३१, अन्वयः— तनय, त्वयि लोकान्तरगते धैर्यं निराधारं (जातम्), विनयः कमिव शरणं यातु ? इह क्षान्तिं वोढुं कः क्षमः ? दानपरता विरता । सत्यं सत्यं हतम् । कृपणा करुणा अद्य क्व व्रजतु ? जगत् शून्यं जातम् ॥

( २४१ ) वृद्धा—हाय बेटा ! हा प्यारे ! गुरुजनों के प्रिय ! तुम कहां हो ? मुझे जवाब दो ! जीमूतकेतु—हाय पुत्र जीमूतवाहन ! हा प्रेमीजनों के प्यारे ! हा सब गुणों के खजाने ! तुम कहां हो ? मुझे उत्तर दो। (हाथों को ऊपर फेंक कर) हाय रे बड़ा कष्ट है !! हे पुत्र तुम्हारे परलोक सिधार जाने पर धैर्य निराश्रय हो गया है। विनय किस की शरण ले ? यहां शान्ति को धारण करने में कौन समर्थ है ? दानशीलता समाप्त हो गई। सच्चाई सचमुच नष्ट हो गई। बेचारी करुणा आज कहां जाए । (तुम्हारे बिना) सारा संसार ही सूना हो गया है। मलयवती—हाय प्राणनाथ ! मुझे छोड़ कर चले गए हो ? अत्यन्त निर्दय मलयवती ! (और) तुझे क्या देखना है जो इस समय तक जी रही है ?

  1. सति सप्तमी ।

( २५२ ) शङ्खचूडः— हा कुमार ! क्वेमं प्राणेभ्योऽपि वल्लभं जनं ^1 परित्यज्य गम्यते ? तदवश्यमन्वेति त्वां शङ्खचूडः । गरुडः— (सोद्वेगम् ) कष्टम् ! ^2 उपरतोऽयं महात्मा । तत् किमिदानीं करोमि ? वृद्धा — (सास्रमूर्ध्वमवलोक्य) भगवंतो लोअपाला ! कहं पि भगवन्तो लोकपालाः ! कथमप्य- अमिदेण सिंचिअ पुत्तअं मे जीवावेहि । मृतेन सिक्त्वा पुत्रकं मे जीवयत । गरुडः— (सहर्षमात्मगतम्) अये ! अमृतसङ्कीर्त्तनात् साधु स्मृतम् । मन्ये प्रमृष्टमयशः । तद्यावत् त्रिदशपतिम- भ्यर्थ्य तद्विसृष्टेनामृतवर्षेण न केवलं जीमूतवाहनम् , एतानपि पूर्वभक्षितानस्थिशेषानाशीविषान् प्रत्युज्जीवयामि । यदि न ददात्यसौ, तदाहम्— पक्षोत्क्षिप्ताम्बुनाथः, पटुजवपवनप्रेर्यमाणे समीरे— नेत्राचिः ^3 प्लोषमूर्च्छाविधुरविनिपतत्सानलद्वादशार्कः । ^4 चञ्च्वा सञ्चूर्ण्य शक्राशनिधनदगदाप्रेतलोकेशदण्डा नन्तः संमग्नपक्षः क्षणममृतमयीं वृष्टिमभ्युत्सृजामि ॥३२॥ श्लोक नं०: ३२, अन्वयः— पक्षोत्क्षिप्ताम्बुनाथः, पटुजवपवनप्रेर्यमाणे समीरे, नेत्राचिंप्लोष- मूर्च्छाविधुरविनिपतन्त्सानलद्वादशार्कः, शक्राशनिधनदगदाप्रेतलोके- शदण्डान् चञ्च्वा सञ्चूर्ण्य अन्तः क्षणं संमग्नपक्षः अमृतमयीं वृष्टिमभ्युत्सृजामि ।

( २५३ ) शङ्खचूड़—हाय कुमार ! प्राणों से भी प्यारे इन प्रियजनों को छोड़कर कहां जा रहे हो ? शङ्खचूड तो अवश्य ही तुम्हारे पीछे (ही) आएगा। गरुड़—(दुःखपूर्वक) हाय कष्ट ! यह महात्मा मर गया। तो अब क्या करूं ? वृद्धा—(आंसुओं के साथ, ऊपर देख कर) हे भगवान लोकपालो। कैसे भी अमृत से सींच कर मेरे बच्चे को जीवित कर दो। गरुड—(हर्षपूर्वक, मन ही मन) अहा, अमृत के नाम से खूब याद आया। मेरा विचार है (अब मेरा) अपयश मिट गया ! अतः इन्द्र से प्रार्थना कर के उन से छोड़ी गई अमृत की वर्षा से न केवल जीमूतवाहन को ही अपितु इन पहिले से खाए गए अस्थिमात्रावशेष साँपों को भी फिर से जिला दूंगा। यदि वह नहीं देगा, तो मैं— पंखों से वरुण को दूर, फेंक कर, बड़े ज़ोर की हवा से पवन देवता को भी (तिनके की तरह) हटा कर, अपने नेत्रों की ज्वाला से जलाने से मूर्च्छित तथा व्याकुल अग्नि के साथ बारहौं सूर्यों को (भी) अपने २ स्थानों से गिरा कर, इन्द्र के वज्र को, कुबेर की गदा को तथा यमराज के दण्ड को अपनी चोंच से चूर २ कर के, अमृत के बीच क्षण भर अपने पंखों को डुबा कर मैं अमृत की वर्षा कर दूँगा।

  1. अनु + इ + लट् + प्रथम पुरुष + एक वचन !
  2. उप + रम् + क्त + प्रथमा एक वचन।
  3. प्लोषः = जलाना।
  4. सम् + चूर्ण् + ल्यप्

( २४४ ) ॰तदयं गतोऽस्मि । [इति साटोपं परिक्रम्य निष्क्रान्तः] जीमूतकेतुः-वत्स शङ्खचूड ! किमद्यापि स्थीयते¹ ? समाहृत्य² दारूणि पुत्रस्य मे विरचय चितां येन वयमप्यनेन सहैव गच्छामः । वृद्धा—पुत्त संखचूडः ! लहु सजेहि । दुक्खं अम्हेहि विणा पुत्र शङ्खचूड ! लघु सञ्जय । दुःखमस्माभिर्विना³ भादुओ दे चिट्ठदि । भ्राता ते तिष्ठति । शङ्खचूडः- (सास्रम् ) यदाज्ञापयन्ति गुरवः । नन्वग्रग एवाहं युष्माकम् [उत्थाय चितारचनां कृत्वा] तात ! अम्ब ! सज्जीकृतेयं चिता । जीमूतवाहनः-कष्टं भोः कष्टं ! उष्णीषः स्फुट एष मूर्धनि विभात्यूर्णेयमन्तर्भ्रुवो- श्चक्षुस्तामरसानुकारि, हरिणा वक्षःस्थलं स्पर्धते ।⁴ चक्राङ्कौ चरणौ, तथापि हि कथं हा वत्स ! मद्दुष्कृतै- स्त्वं विद्याधरचक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यसि ॥३३॥ श्लोक नं०: ३३, अन्वयः- (तव) मूर्धनि एष उष्णीषः स्फुटः विभाति, भ्रुवोः अन्तः इयम् ऊर्णा; चक्षुः तामरसानुकारि; वक्षःस्थलं हरिणा स्पर्धते; चरणौ चक्राङ्कौ; तथापि हि हा वत्स ! कथं मद्दुष्कृतैः त्वं विद्याधर चक्रवर्तिपदवीमप्राप्य विश्राम्यसि ?

( २४५ ) तो यह मैं चला। [यह कहकर गर्व के साथ घूम कर चला जाता है] जीमूतकेतु—बेटा शङ्खचूड ! अब क्यों ठहरे हो ? लकड़ियां लाकर मेरे पुत्र की चिता तैयार करो जिस से हम भी इसी के साथ ही (मर) जाएँ। वृद्धा—पुत्र शङ्खचूड ! शीघ्र तैयार करो । हमारे बिना तुम्हारा भाई दुःखी होगा। शङ्खचूड—(आंसुओं के साथ) जो गुरुजनों की आज्ञा। मैं भी आप के आगे ही जाने वाला हूँ। (उठकर, चिता बना कर) हे तात ! माता जी !! यह चिता तैयार है। जीमूतवाहन— हाय रे, बड़ा कष्ट हो रहा है ! (तेरे) मस्तक पर यह उष्णीष (मुकुटबन्ध) का चिन्ह स्पष्ट रूप से शोभित है, भौहों के बीच में ऊर्णा (भौरी, आवर्त, रोम समूह) है, आंख लाल कमल के समान है, छाती हरि (शेर अथवा विष्णु) की बराबरी करती है. दोनों पैरों में चक्र का निशान हैं। फिर भी, (चक्रवर्ती राजा के इन सब चिन्हों से विभूषित होने पर भी), हे पुत्र, कैसे मेरे बुरे कर्मों के कारण तुम विद्याधरों के चक्रवर्ती का पद पाँए बिना ही विश्राम कर रहे हो

  1. स्था+कर्मवाच्य+लट्+प्रथम पुरुष+एक वचन ।
  2. सम्+आ+हृ+ल्यप् ।
  3. विना के योग में तृतीया ।
  4. दुष्कृत = पाप; बुरे कर्म।

( २४६ ) देवि, किमपरं रुद्यते ? तदुत्तिष्ठ चितायामारोहामः । [सर्वे उत्तिष्ठन्ति] मलयवती-(बद्धाञ्जलिरूर्ध्वं पश्यन्ति)-भअवदि गौरि ! भगवति गौरि ! तुए आणत्तं जहा 'विज्जाहरचक्कवट्टी भट्ठा दे भविस्सदि' त्ति त्वयाज्ञप्तं¹, यथा—विद्याधरचक्रवर्त्ती भर्त्ता ते भविष्यतीति । ता कहं मम मन्दसग्गाए किदे तुमं पि अलीअवादिणी संवुत्ता ? तत्कथं मम मन्दभाग्यायाः ²कृते त्वमप्यलीकवादिनी संवृत्ता ?. [ततः प्रविशति ससम्भ्रमा गौरी] गौरी-महाराज जीमूतकेतो ! न खलु न खलु साहसम्- नुष्ठातव्यम् । जीमूतकेतु :-अये कथममोघदर्शना गौरी ? गौरी-(मलयवतीमुद्दिश्य)-वत्से कथमहमलीकवादिनी भवेयम् ? (नायकमपसृत्य कमण्डलुजलेनाभ्युक्षन्ती)- निजेन जीवितेनापि जगतामुपकारिणः । परितुष्टास्मि ते वत्स ! जीव जीमूतवाहन ॥३४॥ [नायकः उत्तिष्ठति] जीमूतकेतु:-(सहर्षं) देवि दिष्ट्या वर्धसे ! प्रत्युज्जीवितो वत्सः। श्लोक नं०: ३४, अन्वयः- हे वत्स जीमूतवाहन ! निजेन जीवितेनापि जगतामुपकारिणः ते परितुष्टास्मि । जीव ।

( २५७ ) देवि, और अधिक क्यों रोती हो ? अतः उठो, चिता पर चढ़ें . [सब उठते हैं] मलयवती - (हाथ जोड़ कर, ऊपर देखती हुई) भगवती गौरी ! आप ने आज्ञा की थी कि "विद्याधरों का चक्रवती राजा तेरा पति होगा" १। तो क्या मुझ अभागिन के कारण आप भी झूठ बोलने वाली हो गईं २ ? [जल्दी से गौरी का प्रवेश] गौरी- महाराज जीमूतकेतु ! ऐसा साहस मत कीजिए । जीमूतकेतु - अरे, क्या गौरी जी हैं जिन का दर्शन कभी निष्फल नहीं गया ? गौरी- (मलयवती से) पुत्री, मैं कैसे झूठ बोलने वाली हो सकती हूँ (नायक के पास जा कर कमण्डलु के जल से छींटे देती हुई) - हे पुत्र जीमूतवाहन ! अपना जीवन देकर संसार का उपकार करने वाले तुम पर मैं प्रसन्न हूँ । जीते रहो । [नायक उठता है] जीमूतकेतु - (हर्ष पूर्वक) देवि, बड़ी प्रसन्नता की बात है; तुम्हें बधाई हो । (मेरा) बच्चा जी पड़ा ।

  1. प्रथम अङ्क में ।
  2. कृवे के योग में षष्ठी ।

( २३८ )

वृद्धा-भअवदीए पसादेण । [¹ भगवत्याः प्रसादेन । [उभौ गौर्याः पादयोः पतित्वा नायकमालिङ्गतः] मलयवती-(सहर्षं)-दिट्ठिआ पच्चुज्जीविदो अज्जउत्तो । दिष्ट्या प्रत्युज्जीवित आर्यपुत्रः । [गौर्याः पादयोः पतति] नायकः-(गौरीं दृष्ट्वा बद्धाञ्जलिः) भगवति ! अभिलाषिताधिकवरदे¹ ! प्रणिपतितजनार्त्तिहारिणि² ! शरण्ये ! चरणौ नमाम्यहं ते विद्याधर देवते ! गौरि ! ॥३५॥ [इति गौर्याः पादयोः पतति] [सर्वे ऊर्ध्वं पश्यन्ति] । जीमूतकेतुः-अये ! कथममश्रा. वृष्टिः ! भगवति किमेतत् ? गौरी-राजन् जीमूतकेतो ! जीमूतवाहनं प्रत्युज्जीवयितुमेतां- श्वास्थिशेषानुरगपतीन् समुपजातपश्चात्तापेन पक्षिपतिना देवलोकादियममृतवृष्टिः पातिता³। (अङ्गुल्या निर्दिश्य)- किं न पश्यति भवान्⁴ ?— ———————————————————————————— श्लोक नं०, ३५, अन्वयः— अभिलषिताधिकवरदे ! प्रणिपतितजनार्त्ति- हारिणि ! शरण्ये ! विद्याधरदेवते ! गौरि ! अहं चरणौ ते नमामि ।

( २४६ ) वृद्धा- भगवती की कृपा से। [दोनों गौरी के चरणों पर गिर कर नायक को छाती से लगाते हैं] मलयवती - (हर्ष पूर्वक) बड़ी खुशी की बात है। प्राणनाथ जी उठे । [गौरी के चरणों पर गिरती है] नायक - (गौरी को देख कर, हाथ जोड़ कर) भगवती ! इच्छा से भी अधिक वर देने वाली, भक्तजनों के कष्टों को दूर करने वाली, शरण देने वाली, विद्याधरों की कुलदेवी, हे गौरी मैं आप के चरणों में प्रणाम करता हूँ। [यह कह कर गौरी के चरणों पर गिरता है] [सब ऊपर देखते हैं] जीमूतकेतु - अरे, यह बिना बादल के वर्षा कैसे ? भगवती, यह क्या (बात) है ? गौरी - हे राजन् जीमूतकेतु ! जीमूतवाहन और इन अस्थिशेष नागराजाओं को पुनर्जीवित करने के लिए पश्चात्ताप करने वाले गरुड़ के द्वारा स्वर्ग से यह अमृतवर्षा की गई है। (उङ्गली से इशारा करके) क्या आप देख नहीं रहे ? -

  1. जो आगे गिरते हैं; जो प्रणाम करते हैं; जो झुकते हैं; भक्त ।
  2. शरण देने वाली; रक्षा करने वाली; जिस की शरण ली जाए।
  3. पत् + णिच् + क्त + स्त्री लिङ्ग + प्रथमा एक वचन ।
  4. भवान् का प्रयोग प्रथम पुरुष में होता है।

( २६० ) सम्प्राप्ताखण्डदेहाः स्फुटफणमणिभिर्भासुरैरुत्तमाङ्गै- र्जिह्वाकोटिद्वयेन क्षितिममृतरसास्वादलोभाल्लिहन्तः सम्प्रत्याबद्धवेगा मलयगिरिसरिद्वारिपूरा इवामि वक्रैः प्रस्थानमार्गैर्विषधरपतयस्तोयराशि विशन्ति ॥३६॥ (नायकमुद्दिश्य) वत्स जीमूतवाहन ! न त्वं जीवितदान- मात्रस्यैव योग्यः। तदयमपरस्ते प्रसादः- हंसांसाहतहेमपङ्कजरजः सम्पर्कपङ्कोज्झितै- रुत्पन्नैर्मम मानसादुपनतैस्तोयैर्महापावनैः । स्वेच्छानिर्मितरत्नकुम्भनिहितैरेषाभिषिच्य स्वयं त्वां विद्याधरचक्रवर्तिनमहं प्रीत्या करोमि क्षणात् ॥३७॥ श्लोक नं०: ३६, अन्वयः- सम्प्राप्ताखंडदेहः, स्फुटफणमणिभिर्भासुरैरुत्तमाङ्गैः, अमृतरसा- स्वादलोभात् जिह्वाकोटिद्वयेन क्षितिं लिहन्तः, अमी विषधरपतयः सम्प्रति मलयगिरिसरिद्वारिपूरा इव आबद्धवेगाः वक्रैः प्रस्थानमार्गैः तोयराशिं विशन्ति । श्लोक नं० ३७, अन्वयः- हंसांसाहतहेमपङ्कजरजःसम्पर्कपङ्कोज्झितैः, मम मानसात् उत्पन्नैः, स्वेच्छानिर्मितरत्नकुम्भनिहितैः उपनतैः महापावनैः तोयैः एषा अहं स्वयं त्वाम् अभिषिच्य प्रीत्या क्षणात् विद्याधरचक्रवर्तिनं करोमि ।

( २६९ ) (अमृत के प्रभाव से) अपनी पूर्ण देह प्राप्त किए हुए, साफ़ फण की मणियों से जिनके मस्तक चमक रहे हैं, अमृत के रस के लोभ के कारण अपनी जिह्वा की दोनों नोकों से पृथ्वी को चाटते हुए ये नागराज अब मलय पर्वत से बहने वाली नदी के जल- प्रवाह की भ्रान्ति प्रचल वेग से टेढ़े मेढ़े मार्गों से समुद्र में प्रवेश कर रहे हैं। (नायक से) वत्स जीमूतवाहन ! तुम केवल जीवन दान के ही योग्य नहीं हो। अतः यह तुम्हारे लिए दूसरा वरदान है- हंसों के कन्धों से हिलाए गए स्वर्ण कमलों के पराग के सम्पर्क से उत्पन्न हुए पङ्क से रहित, मेरे मानस (मन) से पैदा हुए, अपनी इच्छा से रचे रत्नों के घड़ों में रखे हुए स्वेच्छा प्राप्त, परम पवित्र जल से यह मैं स्वयं तुम्हारा अभिषेक करके प्रेम से शीघ्र ही विद्याधरों का चक्रवर्त्ती राज बनाती हूँ ।

१. सांपों की नदी के जलप्रवाह से तुलना की गई है क्योंकि वे भी सफेद हैं और टेढ़े मेढ़े रास्तों से होकर समुद्र में प्रवेश कर र हैं। २. उपनतैः = प्राप्तैः; समुद्भूतैः; आनीतैः ;

( २६२ ) अपि च, अग्रेसरी भवतु काञ्चनचक्रमेतदेष द्विपश्च धवलो दशनैश्चतुर्भिः । श्यामो हरिर्मलयवत्यपि चेत्यमूनि रत्नानि ते समवलोकय चक्रवर्तिन् ! ॥३८॥ अपि च, आलोक्यन्ताममी मत्प्रचोदिताः शारदशशाङ्कनिर्मल- बालव्यजनहस्ताश्चलच्चूडामणिमरीचिरचितेन्द्रचाप- पंक्तयो भक्त्यावनतपूर्वकायाः प्रणमन्ति मतङ्गदेवादयो विद्याधरपतयः । तदुच्यतां, किं ते भूयः प्रियमुपकरोमि ? नायकः— (जानुभ्यां स्थित्वा) अतः परमपि प्रियमस्ति ? त्रातोऽयं शङ्खचूडः पतगपतिमुखाद्वैनतेयो विनीत- स्तेन प्राग्भक्षिता ये विषधरपतयो जीवितास्तेऽपि सर्वे । मत्प्राणाप्त्या विमुक्ता न गुरुभिरसवश्चक्रवर्त्तित्वमाप्तं, साक्षात् त्वं देवि ! दृष्टा प्रियमपरमतः किं पुनः प्रार्थ्यते यत् ॥३९॥ श्लोक नं०: ३८, अन्वयः— एतत् काञ्चनचक्रम् अग्रेसरीभवतु; चतुर्भिः दशनैः एष धवलो द्विपश्च; श्यामो हरिः; मलयवत्यपि च, इति अमूनि ते रत्नानि चक्रवर्तिन् ! समवलोकय । श्लोक नं०: ३९, अन्वयः— पतगपतिमुखात् अयं शङ्खचूडः त्रातः; वैनतेयः विनीतः; तेन प्राग्भक्षिता ये विषधरपतयः तेऽपि सर्वे जीविताः; मत्प्राणाप्त्या गुरुभिः असवः न विमुक्ताः; चक्रवर्तित्वमाप्तम्; देवि त्वं साक्षात् दृष्टा; पुनः अतः अपरं प्रियं किं यत् प्रार्थ्यते ?

( २६३ ) यह स्वर्ण चक्र तुम्हारे सम्मुख उपस्थित हो (अथवा, है); और चार दान्तों वाला यह सफेद हाथी, काले रंग वाला घोड़ा और मलयवती भी। ये तुम्हारे रत्न हैं। हे चक्रवर्ती (राजा) ! अच्छी तरह देख लो। और भी, देखो मेरे द्वारा प्रेरित, शरत् कालीन चन्द्रमा के समान निर्मल छोटे २ चँवर हाथों में लिए हुए, चञ्चल चूड़ामणि की किरणों से इन्द्रधनुष की पंक्तियां सी बनाते हुए, भक्ति भाव से सिर झुकाए हुए, ये मतङ्गदेव आदि विद्याधरों के राजालोग तुम्हें प्रणाम कर रहे हैं। तो कहो इस से अधिक और तुम्हारा क्या उपकार करूँ ? नायक- (घुटनों के बल बैठ कर) क्या इस से भी अधिक कोई प्रिय वस्तु है ? गरुड़ के मुख से यह शङ्खचूड बचा लिया गया है; गरुड़ विनीत हो गया है; उस के द्वारा पहिले खाए गए जो नागराज थे वे भी सब पुनर्जीवित हो गए हैं; मेरे फिर से प्राण धारण करने से माता पिता ने प्राण नहीं त्यागे; चक्रवर्ती पद भी मिल गया; (और) देवी, आप के साक्षात् दर्शन हो गए। फिर इस से बढ़ कर अधिक प्रिय वस्तु कौनसी हो सकती है जिस के लिए प्रार्थना की जाए ?

  1. हरिः = घोड़ा।
  2. विनता का पुत्र, गरुड़।

( २६४ ) तथापीदमस्तु - [भरत वाक्यम्] - वृष्टिं हृष्टशिखण्डिताण्डवभृतो मुञ्चन्तु काले घनाः, कुर्वन्तु प्रतिरूढसन्ततहरिच्छस्योत्तरीयां क्षितिम् । चिन्वानाः सुकृतानि वीतविपदो निर्मत्सरैर्मानसै— मोदन्तां घनबद्धबान्धवसुहृद्गोष्ठीप्रमोदाः प्रजाः ॥४०॥ अपि च— शिवमस्तु सर्वजगतां परहितनिरता भवन्तु भूतगणाः । दोषाः प्रयान्तु नाशं सर्वत्र सुखी भवतु लोकः ॥४१॥ [इति निष्क्रान्ताः सर्वे] ॥ इति पञ्चमोऽङ्कः ॥ ॥ इति नागानन्दम् ॥ श्लोक नं०: ४०, अन्वयः — हृष्टशिखण्डिताण्डवभृतो घनः काले वृष्टिं मुञ्चन्तु; प्रतिरूढ- सन्ततहरिच्छस्योत्तरीयां क्षितिं कुर्वन्तु; प्रजाः वीतविपदः निर्मत्सरैः मानसैः सुकृतानि चिन्वानाः घनबद्धबान्धवसुहृद्गोष्ठी- प्रमोदाः मोदन्ताम् ॥ श्लोक नं०: ४१, अन्वयः — सर्वजगतां शिवमस्तु; भूतगणाः परहितनिरता भवन्तु; दोषाः नाशं प्रयान्तु; लोकः सर्वत्र सुखी भवतु ॥

( २६५ ) फिर भी यह हो— (भरतवाक्य)— प्रसन्न हुए मोरों को नचाते हुए वादल समय पर वर्षा करें और पृथ्वी को उगे हुए घने हरे धानों की चादर से ढक दें। [तथा प्रजा के लोग विपत्तियों से मुक्त हो ईर्ष्या-रहित मनों से पुण्य सञ्चय करते हुए बन्धुओं तथा मित्रों के साथ घनी गोष्ठियों में आनन्द मनाते हुए प्रसन्न रहें। और भी— सारे विश्व का कल्याण हो। सब प्राणी दूसरों के हित करने में लगे रहें। सब दोष न हों। (और) लोग सर्वत्र सुखी हों। [सब का प्रस्थान] ॥ पाँचवां अङ्क समाप्त ॥ ॥ नागानन्द (नाटक) समाप्त ॥

  1. चि+शानच्+प्रथमा बहुवचन ।

“परिशिष्ट”