नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( २६९ ) (अमृत के प्रभाव से) अपनी पूर्ण देह प्राप्त किए हुए, साफ़ फण की मणियों से जिनके मस्तक चमक रहे हैं, अमृत के रस के लोभ के कारण अपनी जिह्वा की दोनों नोकों से पृथ्वी को चाटते हुए ये नागराज अब मलय पर्वत से बहने वाली नदी के जल- प्रवाह की भ्रान्ति प्रचल वेग से टेढ़े मेढ़े मार्गों से समुद्र में प्रवेश कर रहे हैं। (नायक से) वत्स जीमूतवाहन ! तुम केवल जीवन दान के ही योग्य नहीं हो। अतः यह तुम्हारे लिए दूसरा वरदान है- हंसों के कन्धों से हिलाए गए स्वर्ण कमलों के पराग के सम्पर्क से उत्पन्न हुए पङ्क से रहित, मेरे मानस (मन) से पैदा हुए, अपनी इच्छा से रचे रत्नों के घड़ों में रखे हुए स्वेच्छा प्राप्त, परम पवित्र जल से यह मैं स्वयं तुम्हारा अभिषेक करके प्रेम से शीघ्र ही विद्याधरों का चक्रवर्त्ती राज बनाती हूँ ।
१. सांपों की नदी के जलप्रवाह से तुलना की गई है क्योंकि वे भी सफेद हैं और टेढ़े मेढ़े रास्तों से होकर समुद्र में प्रवेश कर र हैं। २. उपनतैः = प्राप्तैः; समुद्भूतैः; आनीतैः ;