नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २५७ ) देवि, और अधिक क्यों रोती हो ? अतः उठो, चिता पर चढ़ें . [सब उठते हैं] मलयवती - (हाथ जोड़ कर, ऊपर देखती हुई) भगवती गौरी ! आप ने आज्ञा की थी कि "विद्याधरों का चक्रवती राजा तेरा पति होगा" १। तो क्या मुझ अभागिन के कारण आप भी झूठ बोलने वाली हो गईं २ ? [जल्दी से गौरी का प्रवेश] गौरी- महाराज जीमूतकेतु ! ऐसा साहस मत कीजिए । जीमूतकेतु - अरे, क्या गौरी जी हैं जिन का दर्शन कभी निष्फल नहीं गया ? गौरी- (मलयवती से) पुत्री, मैं कैसे झूठ बोलने वाली हो सकती हूँ (नायक के पास जा कर कमण्डलु के जल से छींटे देती हुई) - हे पुत्र जीमूतवाहन ! अपना जीवन देकर संसार का उपकार करने वाले तुम पर मैं प्रसन्न हूँ । जीते रहो । [नायक उठता है] जीमूतकेतु - (हर्ष पूर्वक) देवि, बड़ी प्रसन्नता की बात है; तुम्हें बधाई हो । (मेरा) बच्चा जी पड़ा ।
- प्रथम अङ्क में ।
- कृवे के योग में षष्ठी ।