भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 279, कुल 309 में से

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पृष्ठ 279

( २४५ ) तो यह मैं चला। [यह कहकर गर्व के साथ घूम कर चला जाता है] जीमूतकेतु—बेटा शङ्खचूड ! अब क्यों ठहरे हो ? लकड़ियां लाकर मेरे पुत्र की चिता तैयार करो जिस से हम भी इसी के साथ ही (मर) जाएँ। वृद्धा—पुत्र शङ्खचूड ! शीघ्र तैयार करो । हमारे बिना तुम्हारा भाई दुःखी होगा। शङ्खचूड—(आंसुओं के साथ) जो गुरुजनों की आज्ञा। मैं भी आप के आगे ही जाने वाला हूँ। (उठकर, चिता बना कर) हे तात ! माता जी !! यह चिता तैयार है। जीमूतवाहन— हाय रे, बड़ा कष्ट हो रहा है ! (तेरे) मस्तक पर यह उष्णीष (मुकुटबन्ध) का चिन्ह स्पष्ट रूप से शोभित है, भौहों के बीच में ऊर्णा (भौरी, आवर्त, रोम समूह) है, आंख लाल कमल के समान है, छाती हरि (शेर अथवा विष्णु) की बराबरी करती है. दोनों पैरों में चक्र का निशान हैं। फिर भी, (चक्रवर्ती राजा के इन सब चिन्हों से विभूषित होने पर भी), हे पुत्र, कैसे मेरे बुरे कर्मों के कारण तुम विद्याधरों के चक्रवर्ती का पद पाँए बिना ही विश्राम कर रहे हो

  1. स्था+कर्मवाच्य+लट्+प्रथम पुरुष+एक वचन ।
  2. सम्+आ+हृ+ल्यप् ।
  3. विना के योग में तृतीया ।
  4. दुष्कृत = पाप; बुरे कर्म।
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