भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 283, कुल 309 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 283

( २४६ ) वृद्धा- भगवती की कृपा से। [दोनों गौरी के चरणों पर गिर कर नायक को छाती से लगाते हैं] मलयवती - (हर्ष पूर्वक) बड़ी खुशी की बात है। प्राणनाथ जी उठे । [गौरी के चरणों पर गिरती है] नायक - (गौरी को देख कर, हाथ जोड़ कर) भगवती ! इच्छा से भी अधिक वर देने वाली, भक्तजनों के कष्टों को दूर करने वाली, शरण देने वाली, विद्याधरों की कुलदेवी, हे गौरी मैं आप के चरणों में प्रणाम करता हूँ। [यह कह कर गौरी के चरणों पर गिरता है] [सब ऊपर देखते हैं] जीमूतकेतु - अरे, यह बिना बादल के वर्षा कैसे ? भगवती, यह क्या (बात) है ? गौरी - हे राजन् जीमूतकेतु ! जीमूतवाहन और इन अस्थिशेष नागराजाओं को पुनर्जीवित करने के लिए पश्चात्ताप करने वाले गरुड़ के द्वारा स्वर्ग से यह अमृतवर्षा की गई है। (उङ्गली से इशारा करके) क्या आप देख नहीं रहे ? -

  1. जो आगे गिरते हैं; जो प्रणाम करते हैं; जो झुकते हैं; भक्त ।
  2. शरण देने वाली; रक्षा करने वाली; जिस की शरण ली जाए।
  3. पत् + णिच् + क्त + स्त्री लिङ्ग + प्रथमा एक वचन ।
  4. भवान् का प्रयोग प्रथम पुरुष में होता है।