नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( २४६ ) वृद्धा- हाय, यह ऐसा क्या हो रहा है ? (छाती पीटती हुई) बचाओ बचाओ !. यह मेरा बच्चा मर रहा है। मलयवती - हाय प्राणनाथ ! (हमें) छोड़ने की इच्छा वाले से दीखते हो। नायक- (हाथ जोड़ने की इच्छा करता हुआ) शङ्खचूड ! मेरे हाथों को (एक दूसरे के) समीप कर दो । शङ्खचूड- (वैसा ही करते हुए) हाय, संसार अनाथ कर दिया गया है। नायक- (आधी खुली आंखों से माता पिता को देखते हुए) हे तात ! हे माता जी !! यह मेरा अन्तिम प्रणाम है। क्योंकि- ये अंग चेतनाहीन हो गए हैं। कान साफ़ अक्षर तथा शब्दों वाली वाणी (भी) नहीं सुनता। दुःख की बात है कि यह आँख भी सहसा ही बन्द हो रहा है। हे तात ! बेबस हुए हुए मेरे ये प्राण जा रहे हैं॥ अथवा इस प्रलाप से क्या लाभ? ["संरक्षता पन्नगमेव पुण्यम्" इत्यादि पहिले कहे श्लोक (अंक ४) को पढ़कर गिर पड़ता है]
- क्या लाभ ? इस अर्थ में इस के साथ पञ्चमी आती है ।