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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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ब्राह्मण्य की शक्ति का उन पर बड़ा प्रभाव हुआ । अतः वे भी घोर तपस्या करने लगे । यहां तक कि लोग उन्हें क्रमशः राजर्षि, ऋषि, महर्षि और ब्रह्मर्षि कहने लगे । परन्तु जब तक स्वयं वसिष्ठ जी ने आकर उन्हें ब्रह्मर्षि नहीं कहा तब तक उन को सन्तोष नहीं हुआ। इस को कई सहस्र वर्ष लग गए। परन्तु इन की शक्ति इस से कहीं पहिले भी दृष्टिगोचर होने लगी थी । एक बार इन्द्र के हाथों से शुनःशेप को छुड़ाने के लिए इन्होंने त्रिशंकु को सशरीर स्वर्ग को भेज दिया । श्री रामचन्द्र जी को भी इन्होंने कई दिव्य जृम्भकास्त्रादि दिए थे ।

एक बार घोर अकाल पड़ा । भोजन की खोज में घूमते घूमते विश्वामित्र जी चांडालों के एक ग्राम में पहुंचे । वहां एक घर में उन्हें कुत्ते का मांस दिखाई दिया । रात्री के समय जब घर वाले सो रहे थे तो उन्हों ने वह मांस चुराने का प्रयत्न किया परन्तु एक चंडाल जाग रहा था । उस ने पकड़ लिया । जब उसे यह ज्ञान हुआ कि यह विश्वामित्र हैं तो उनसे वाद- विवाद करने लगा कि क्या यह आप के लिए उचित था। उन्हों ने उत्तर दिया कि जब अपना जीवन संकट में हो तो अपने प्राणों की रक्षा के लिए चोरी करना कोई पाप नहीं ! यह कह कर मांस का थोड़ा भाग देवी को बलि देकर शेष स्वयं खा गए।

१५. गौतम = यह चोल देश के किसी गाँव का एक ब्राह्मण था । आजीविका के लिए घर छोड़ शबरों में जा मिला और एक शबरी विधवा से विवाह कर लिया । एक वन में रह कर पशु पक्षियों को मार कर निर्वाह किया करता था। कुछ समय के