नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ें( २७५ ) २५. लोकपालाः = आठों दिशाओं के रक्षक देवता। पूर्व से घड़ी की सुई के अनुसार वे इस प्रकार हैं:— इन्द्र, अग्नि यम, नैऋत वरुण, मरुत्, कुबेर और ईश । २६ त्रिदशपति = इन्द्र । देवताओं का स्वामी । देवता को त्रिदश इस लिए कहते हैं कि वह सदा तीस वर्षों का ही रहता है, अथवा उस की तीन दिशाएँ होती हैं । जन्म, सत्ता और अविनाश । अथवा, "तृतीया यौवनाख्या दशा सदा येषाम्", अर्थात् जो सदा जवान रहते हैं, कभी बूढ़े नहीं होते । II. नाट्य-कला-सम्बन्धी परिभाषाएँ:— १. नान्दी — प्रस्तावना अथवा स्थापना के आरम्भ में आने वाले श्लोकों को नान्दी कहते हैं इस में किसी देवता का स्तुतिगान होता है अथवा सामाजिकों के लिए आशीर्वाद । कभी कभी इस में नाटक की कथावस्तु की ओर भी संकेत होता है कभी श्लोक-रचना ऐसी होती है कि वर्णों को विशेष रूप से मिलाने से नाटक के प्रधानपात्रों के नाम बन जाते हैं । भरत-नाट्य-शास्त्र में लिखा है:— "पूर्वं कृता मया नान्दी आशीर्वचनसंयुता।" मल्लिनाथ ने इस का लक्षण यह दिया है:— "आशीर्नमस्क्रियारूप श्लोकः काव्यार्थसूचकः ।" नान्दी शब्द नन्द् धातु से निकला है, जिसका अर्थ है 'प्रसन्न होना' । तो नान्दी का अर्थ हुआ 'हर्ष' अथवा 'प्रसन्नता' । नाट्यप्रदीप में यही अर्थ मिलता है:—