भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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( २७७ ) “कुशीलवकुटुम्बस्य स्थलं नेपथ्यमुच्यते” कभी कभी परिमित रूप में नेपथ्य का अर्थ ‘पर्दा’ ही लिया जाता है। त्रिश्वलोचन ने पर्दे को नेपथ्य भी कहा है। ३. स्थापना (अथवा प्रस्तावना) — भास नाटकचक्र तथा ‘मत्तविलास’ आदि में ‘स्थापना’ शब्द का प्रयोग हुआ है। इस अर्थ में साधारणतः ‘प्रस्तावना’ शब्द का ही प्रयोग होता है। साहित्य-दर्पण में इस का यह लक्षण दिया गया है :— “नटी विदूषको वापि पारिपार्श्विक एव वा। सूत्रधारेण सहितः संलापं यत्र कुर्वते॥ चित्रैर्वाक्यैः स्वकार्योत्थैः प्रस्तुताक्षेपिभिर्मिथः। आमुखं तत्तु विज्ञेयं नाम्ना प्रस्तावनापि सा॥” नाट्य-शास्त्र के अनुसार इस का लक्षण इस प्रकार है:— “प्रसाद्य रङ्गं विधिवत् कवेर्नाम च कीर्तयेत्। प्रस्तावनां नटः कुर्यात् काव्यप्रख्यापनाश्रयाम्॥” इस लक्षण से यह स्पष्ट है कि स्थापना तथा प्रस्तावना एक ही हैं। ‘भरत’ के अनुसार स्थापना ‘स्थापक’ के द्वारा कही जानी चाहिए:— ‘स्थापकेन स्थाप्यत इति स्थापना।’ इस में सूत्रधार, नटी, विदूषक अथवा पारिपार्श्विक से अपने कार्य के विषय में विचित्र उक्ति से इस प्रकार बातचीत करता है जिस से प्रस्तुत कथा की सूचना मिलती है।

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