नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३३ ) नायक - (बड़े चाव के साथ देखते हुए) मित्र, मैं यह तो नहीं जानता यह कौन है । परन्तु इतना जानता हूँ कि- यदि यह स्वर्ग की देवकन्या है तो इन्द्र की हज़ार आँखें (इसे देखने से) सफल हो गईं ; यदि यह नागकन्या है तो इस के मुख के होते हुए पाताल चन्द्रमा से रहित नहीं ; यदि यह विद्याधरी है तो हमारी जाति ने अन्य सब जातियों को परास्त कर दिया (समझो), और यदि यह सिद्धों के वंश में उत्पन्न हुई है तो फिर सिद्ध लोग त्रिलोकि में प्रसिद्ध हो गए (समझो)॥ विदूषक - (नायक को देख कर, हर्ष के साथ, मन ही मन)-सौभाग्य से बहुत दिनों के पश्चात् यह कामदेव के वश में पड़ा है । (अपनी ओर इशारा करके, खाने का अभिनय करते हुए) अथवा , (कामदेव के) नहीं, केवल मुझ ब्राह्मण के (वश में पड़ा है) । चेटी- (प्रेम पूर्वक) राजकुमारी ! मैं तो कहती हूँ कि इस दयाहीन देवी के आगे वीणा बजाने से क्या लाभ ? [ यह कह, वीणा छीन लेती है ]
- हरे: = इन्द्र की । अर्थात् इन्द्र की हज़ार आंखों का होना व्यर्थ ही नहीं गया । इस (नायिका) की सुन्दरता की क़दर पाने के लिए दो की बजाए हज़ारों की आवश्यकता है ।
- शशभृत् = चंद्रमा । शश का अर्थ है ख़रगोश । चन्द्रमण्डल में जो दाग़ है उसे ख़रगोश की उपमा देते हैं । इसलिए चन्द्रमा को शशाङ्क अथवा शशभृत् कहते हैं । पाताल में चन्द्रमा नहीं होता, परन्तु इसका मुख उस कमी को पूरा कर रहा है । अर्थात् इस का मुख चन्द्रमा के समान सुन्दर है । 3. अन्वय = कुल, वंश ।