नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
DevanagariHindipublished309 पृष्ठ
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( ४१ ) विदूषक — श्रीमती जी, क्या यहां आप के तपोवन में यही रीति है कि आए हुए अतिथि का शब्दों से भी सत्कार नहीं किया जाता ? चेटी — (नायक को देखकर, अपने आप) इस की दृष्टि तो मानों इसी पर अनुरक्त है। अच्छा तो फिर ऐसे कहती हूं। (प्रकट) राजकुमारी, यह ब्राह्मण ठीक ही कहता है। अतिथि का सत्कार करना आपके लिए उचित ही है। तो फिर ऐसे महानु- भाव के विषय में आप किंकर्तव्य विमूढ़ सी क्यों खड़ी है ? अथवा तू ठहर। मैं ही यथोचित करती हूं। (नायक से) आर्य, आप का स्वागत है। आसन ग्रहण करके इस स्थान को अलंकृत कीजिये। विदूषक — मित्र ! यह ठीक कहती है।
- आचारः = रीति, रिवाज।
- प्रतिपत्तिम्मूढा = जो यह नहीं जानती कि क्या करना चाहिए। अथवा, उचित व्यवहार क्या है ?
- ‘स्वागतं’ के साथ प्रायः चतुर्थी आती है।