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नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

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पृष्ठ 77

( ४३ ) यहां बैठ कर थोड़ा आराम (ही) कर लें। नायक—तुम ने ठीक ही कहा है (दोनों बैठ जाते हैं।) नायिका—(चेटी से) अरी परिहासशील ! ऐसा मत कर। यदि कदाचित् कोई तपस्वी देख ले तो मुझे निर्लज्ज ही समझेगा। [एक तपस्वी का प्रवेश] तपस्वी—कुलपति कौशिक ने मुझे आज्ञा दी है कि “वत्स शाण्डिल्य, पिता की आज्ञा से सिद्धराज मित्रवसु विद्याधरों के भावी चक्रवर्ती सम्राट् जीमूतवाहन को, जो यहीं मलय पर्वत पर ही कहीं है, अपनी बहिन मलयवती लिए वर निश्चित करने के लिए आज ही देखने गए हैं। उसकी प्रतीक्षा करते हुए मलयवती को कदाचित् दोपहर के स्नान का समय बीत जाए ; अतः उसे बुला लाओ।” इसलिए गौरी मन्दिर को ही जाता हूं। (घूमकर, पृथ्वी को देख कर, आश्चर्य के साथ) अरे, इस धूलियुक्त प्रदेश पर किस के पैरों के चिह्न हैं जिनमें चक्र स्पष्ट दिखाई दे रहा है। (आगे जीमूतवाहन को देख कर) निश्चय ही ये पदचिह्न इसी महानुभाव के हैं। क्योंकि—

  1. अविनीता = जो विनीत नहीं;, निर्लज्ज, उद्दण्ड।
  2. ‘कुलपति’ = कुलपति उस ऋषि को कहते हैं जो १०,००० छात्रों को पढ़ाता है। वही उनके भोजन तथा वस्त्र आदि का भी प्रबन्ध करता है। अथवा, ऋषि-श्रेष्ठ, ऋषि-गुरु।
  3. कहते हैं जिसके पैरों की लकीरों में चक्र का चिन्ह हो वह चक्रवर्ती बनता है।