भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 309 में से

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पृष्ठ 79

मस्तक पर यह उष्णीष (मुकुट) का सा चिह्न स्पष्ट दिखाई दे रहा है। भौंहों के बीच ऊर्णा (भौरी) का सा चिह्न शोभायमान है। लाल कमल के समान इस के नेत्र हैं। छाती शेर का मुकाबला करती है। और क्योंकि इस के दोनों पैरों में चक्र का चिह्न है। इससे मेरा विचार है कि यह—जो भी कोई यह है— विद्याधरों के चक्रवर्ती पद को प्राप्त किए बिना आराम नहीं करेगा ॥ अथवा, सन्देह से क्या ? स्पष्ट ही यह जीमूतवाहन ही होगा । (मलयवती को देखकर) अरे, यह राजकुमारी भी (यहाँ) ? [दोनों को देख कर] यदि विधाता एक दूसरे के योग्य इस जोड़ी को मिला दे तो (समझो कि) बड़ी देर बाद उसने कोई ठीक- काम किया है। (पास जाकर, नायक से) आप का कल्याण हो । नायक — भगवन् मैं जीमूतवाहन आपको प्रणाम करता हूँ। (उठना चाहता है) । तापस — नहीं नहीं, उठिए मत । “अतिथि सब का पूज्य होता है”, इसलिए आप ही हमारे पूजनीय हैं। अतः सुखपूर्वक बैठे रहिए । नायिका — आर्य ! मैं प्रणाम करती हूँ । १. लाल कमल । २. कृतं के साथ तृतीया आती है । ३. पूरा श्लोक इस प्रकार है:— गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः॥ पतिरेको गुरुः स्त्रीणां सर्वस्याभ्यागतो गुरु.॥

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