नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)
Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary
सम्राट हर्षवर्धन द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 309 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४७ ) तापस— (नायिका से) बच्ची, (ईश्वर करे) तू योग्य पति को प्राप्त करे । राजपुत्रि, कुलपति कौशिक ने तुम्हें कहा है कि 'दोपहर के स्नान पूजा का समय बीता जा रहा है, अतः शीघ्र आ जाओ' । नायिका— जैसी गुरुजनों की आज्ञा । (मन में) — एक ओर गुरु जी की आज्ञा है और दूसरी ओर प्रियतम के दर्शनों का सुख । इस प्रकार जाने अथवा न जाने के विषय में अनिश्चित मेरा मन अब भी डांवांडोल है ॥ [उठकर तथा गहरी सांस लेकर लज्जा और प्रेम से नायक को देखती हुई तपस्वी के साथ चली जाती है] नायक (उत्कण्ठापूर्वक गहरी सांस लेकर जाती हुई नायिका को देखते हुए) — विशाल नितम्बों के भार से मन्द गति वाली इस सुन्दरी ने अन्यत्र जाते हुए भी मेरे मन में पैर जमा लिया है ॥ विदूषक— अरे जो देखने योग्य वस्तु थी वह आप ने देख ली है । तो अब दोपहर के सूर्य की गर्मी से मानों दुगनी हुई मेरी पेट की अग्नि प्रज्वलित हो रही है । अतः आओ हम चलें, ताकि
- दोलायते = दोला इव आचरति । क्वि प्रत्यय ।
- धम धम का शब्द करती है । धूँ धूँ कर रही है। अर्थात् अति प्रज्वलित हो रही है ।