भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

DevanagariHindipublished309 पृष्ठ

पृष्ठ 87, कुल 309 में से

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पृष्ठ 87

( ५३- ) ! "सखि चतुरिके ! फूलों के चुनने के परिश्रम से मेरा शरीर बहुत थक गया है। शरद् ऋतु की धूप से मानों उत्पन्न हुई गरमी मुझे बहुत कष्ट दे रही है। अतः तू जा और कोमल केले के पत्तों से ढके हुए चन्दनलतागृह में चन्द्रमणि शिला के तल को तैयार कर।" और जैसी (उनकी) आज्ञा थी मैं ने कर दिया है। तो जाकर राजकुमारी को (इसकी) सूचना देती हूँ। मनोहरिका - यदि ऐसा है तो जल्दी जाकर बता ताकि वहां जाकर उस का कष्ट शान्त हो। चतुरिका - (हंस कर, मन ही मन) उसका सन्ताप ऐसा नहीं जो इस प्रकार शान्त हो जाएगा ! मेरा तो विचार है कि एकान्त और रमणीय चन्दनलता गृह को देखने से इसका सन्ताप और भी बढ़ेगा। (प्रकट) अच्छा तू जा।

  1. गरमी, दुःख, कष्ट।
  2. लघु = जल्दी, शीघ्र !
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