भारतकोश
नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

नागानन्दम् (सम्राट हर्षवर्धन - संस्कृत मूल एवं हिन्दी व्याख्या)

Nagananda Nataka of Emperor Harsha with Commentary

सम्राट हर्षवर्धन द्वारा

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( ५५ ) मैं भी जाकर राजकुमारी को सूचना देती हूँ कि चन्द्रमणि शिलातल तैयार है। (दोनों चली जाती हैं) [प्रवेशक समाप्त] [उत्कण्ठित मलयवती और चेटी का प्रवेश] मलयवती— (गहरी सांस लेकर, मन ही मन) हे हृदय ! उस समय उस (प्रिय से) लज्जावश मुझे पराङ्मुख करके अब तू स्वयं वहीं (उसके पास) चला गया है। अहो, तेरी स्वार्थपरता ! (प्रकट) सखि चतुरिका ! भगवती (गौरी) के मन्दिर का मार्ग दिखा। चेटी —(मन ही मन) चली तो थी चन्दनलतागृह को, पर कहती है 'देवी के मन्दिर का मार्ग' । (प्रकट) राजकुमारी, आप तो चन्दनलतागृह की ओर चली थीं ।