नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)
Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary
महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८६ नैषधचरितम् । [ द्वितीयः दमयन्ती के मुख की आरती उतारने के लिए, ब्रह्मा उस आरती-पात्र ( कसोरे ) के समान घुमाते रहते हैं ॥२६॥ सुषमाविषये परीक्षणे निखिलं पद्ममभाजि तन्मुखात् । अधुनापि न भङ्गलक्षणं सलिलोन्मज्जनमुज्झति स्फुटम् ॥२७॥ सुषमेति । [ सुषमाविषये ] सुषमा परमा शोभा, सैव विषयः, यस्मिन् । परीक्षणे = जलदिव्यशोधने कृते निखिलं पद्मं = पद्मजातं तन्मुखात् अपादानात्, भङ्गावधित्वात् अभाजि = अभञ्जि, स्वयमेव भग्नमभूदित्यर्थः । स्फुटं । कर्त्तरि लुङ् । 'भञ्जेश्च चिणि' इति वैभाषिको नकारलोपः । अत एव अधुनापि भङ्गलक्षणं= पराजयचिह्नं [ सलिलोन्मज्जनं ] सलिलादुन्मज्जनं क्षणमपि नोज्झति = न जहाति । जलदिव्योन्मज्जनस्य पराजयलिङ्गत्वस्मरणादिति भावः । उन्मज्जनक्रिया- निमित्तेयं भङ्गोत्प्रेक्षा ॥२७॥ सर्वोत्तम शोभा की परीक्षा ( अर्थात् कमलों की परमा शोभा है, अथवा दमयन्ती के मुख की; इस परीक्षा-प्रतिद्वन्द्विता ) में सब कमल दमयन्ती के मुख से स्वयं ही पराजित हो गये । वे जल के ऊपर मस्तक उठाये रहते हैं—जिससे स्पष्ट है कि आज भी वे अपनी पराजय के चिह्न को नहीं छोड़ रहे हैं। [ जिस प्रकार प्राचीन काल में जल-दिव्य परीक्षा में कोई धनुष खींचकर तीर छोड़ता था और दूसरा व्यक्ति वहाँ दौड़कर आता था और उस समय तक दिव्यकारी पुरुष को जल में सिर डुबाये हुए देखता था तो उसकी जय मानता था; और जल से ऊपर मस्तक उठाये देखता था तो उसकी पराजय मानता था । उसी प्रकार कमल का जल के ऊपर मस्तक उठाये रखने से स्पष्ट है कि सुषमा की जल-दिव्य-परीक्षा में दमयन्ती के मुख से उसकी पराजय हुई है ] ॥२७॥ धनुषी रतिपञ्चबाणयोरुदिते विश्वजयाय तद्भ्रुवौ । नलिके न तदुच्चनासिके त्वयि नालीकविमुक्तिकामयोः ॥२८॥ धनुषी इति । तद्भ्रुवौ विश्वजयाय उदिते=उत्पन्ने रति-पञ्चबाणयोर्ध- नुषी, नूनमित्यादिव्यञ्जकाप्रयोगाद्गम्योत्प्रेक्षा । किञ्च; [ तदुच्चनासिके ] तस्याः दमयन्त्याः, उच्चनासिके उन्नतनासापुटे, त्वयि [ नालीक-विमुक्ति-कामयोः ] नालीकानां द्रोणिचापशराणां, विमुक्ति कामयेते इति तथोक्तयोः तयोः । 'शिलिका-