भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 129, कुल 226 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 129

सर्गः २ ] जीवातु-मद्यन्तिकासहितम् ११३ कृता इव = इत्युत्प्रेक्षा । साऽपि सत्यवादिना नारदेनोक्तेरपि विपरीता अजनि । सर्वोपरिस्थितायाः पुनरधःस्थितिः वैपरीत्यम् ॥ ८४ ॥ उस सत्यवादी नारद ने (विष्णुपुराण में) कहा था कि राजा बलि का पाताल रूपी स्वर्ग, स्वर्गलोक से भी ऊपर (उत्कृष्ट) है। पर, पृथिवी की अलङ्कार-रूपा इस कुण्डिन नगरी ने (अपनी स्थापना के अनन्तर, अपने सौन्दर्य से) उस (पाताल लोकरूपी स्वर्ग) को भी अधर कर (नीचा दिखला) दिया । अतः अब वह (बलिलोक) विपरीत (उल्टी अर्थात् निम्न श्रेणी की) हो गयी है ॥८४॥ प्रतिहट्टपथे घरट्टजात् पथिकाह्वानदसक्तुसौरभैः । कलहान्न घनान् यदुत्थितादधुनाप्युज्झति घर्घरस्वरः ॥८५॥ प्रतीति । [पथिकाह्वानद-सक्तुसौरभैः ] पन्थानं गच्छन्तीति पथिकाः, तेषामाह्वानं ददातीति तथोक्तमाह्वायिकम्, अध्वानं गच्छतामाकर्षकमित्यर्थः । सक्तूनां सौरभं सुगन्धो यस्मिन् प्रतिहट्टपथे = प्रत्यापणपथे । 'अव्ययं विभक्ति' इत्यादिना वीप्सायामव्ययीभावः । 'तृतीयासप्तम्योर्बहुलम्' इति सप्तम्या अम्भावः । [ घरट्ट- जात् ] घरट्टाः गोधूमचूर्णग्रावाणः तज्जात्, [ यदुत्थितात् ] यस्या नगर्याः उत्थि- तात् कलहात् घर्घरस्वरः = निर्झरस्वरः कण्ठध्वनिः घनान् = मेघान् अधुनापि नोज्झति = न त्यजति । सर्वदा सर्वहट्टेषु घरट्टा मेघध्वानं ध्वनन्तीति भावः । अत्र घनानां घरट्टकलहासम्बन्धेऽपि सम्बन्धोक्तेरतिशयोक्तिः । तथा च घर्घरस्वनस्य तद्धेतु- कत्वोत्प्रेक्षा व्यञ्जकाप्रयोगात् गम्येति सङ्करः ॥८५॥ प्रत्येक हाट में पथिकों को बुलाने वाली सत्तू की सुगन्धि से, जाँतों के कारण उत्पन्न हुए, कलह के द्वारा — घर्घर की आवाज़ — आज दिन भी मेघों को नहीं छोड़ रही है । [ अर्थात् काले-काले बादल अपनी गड़गड़ाहट से प्रवासी प्रेमियों को अपने अपने घर जाने के लिए प्रेरणा कर रहे हैं । उधर कुण्डिन नगर के हर बाजार में जाँता-चकियाँ चल रही हैं, जिनमें खूब सुगन्धित सत्तू पीसे जा रहे हैं । अतः वे इस प्रकार घर्घर-घर्घर की आवाज़ कर रही हैं मानों पथिकों को वहाँ रुकने के लिए निमन्त्रण दे रही हैं। यह देखकर (पथिक को प्रेरणा करनेवाले) मेघ और (पथिक को अपने यहाँ रोकनेवाली) जाँतों में पारस्परिक वाक्कलह हुआ (आपसी कहा-सुनी हो गयी) । इसमें स्वरभङ्ग हो (गला बैठ) जाने के कारण मेघों की घर्घर ध्वनि हो गयी—जो आज दिन तक सुनाई पड़ती है ] ॥८५॥ ८