भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 226 में से

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१२२ नैषधचरितम्। [द्वितीयः भूते शेषे शेते इति तच्छायिनः, पीतवाससः = पीताम्बरस्य विष्णोः सखितां = सदृशताम्, आदित = अगृहीत्। इत्युपमालङ्कारः ॥१०१॥ अमृतद्युति (चन्द्रमा) का (काले रङ्ग का मृग) लाञ्छन-उस नगरी की वलभी (सबसे ऊपरी मञ्जिल) पर लगी हुई, पीतवर्ण वाली पताका से मिलकर- मण्डलाकार हुए शेषनाग के ऊपर शयन करनेवाले, पीताम्बरधारी विष्णु की समानता करता था ॥१०१॥ अश्रान्त-श्रुति-पाठ-पूत-रसनाऽऽविर्भूत-भूरि-स्तवा- जिह्म-ब्रह्म-मुखौघ-विघ्नित-नव-स्वर्गक्रिया-केलिना। पूर्वं गाधिसुतेन सामिघटिता मुक्ता नु मन्दाकिनी यत्प्रासाद-दुकूल-वल्लिरनिलान्दोलैरखेलद्दिवि ॥१०२॥ अश्रान्ते। [ यत्प्रासाद-दुकूल-वल्लिः ] यस्याः नगर्याः, प्रासादे दुकूलं वल्लिरिव दुकूलवल्लिः, दुकूलमयी पताकेत्यर्थः। [अश्रान्त-श्रुति-पाठ-पूत-रसना- विर्भूतभूरि-स्तवाजिह्म-ब्रह्म-मुखौघ-विघ्नित-नव-स्वर्ग क्रिया-केलिना ] अश्रा- न्तेन श्रुतिपाठेन नित्यवेदपाठेन, पूताभ्यः पवित्राभ्यः, रसनाभ्यो जिह्वाभ्यः, आविर्भूतेषु भूरिस्तवेषु अनेकस्तोत्रेषु, अजिह्वेन अकुण्ठेन, ब्रह्मणो मुखानामोघेन हेतुना। विघ्निती सञ्जातविघ्ना, नवस्वर्गक्रिया नूतनस्वर्गसृष्टिरेव केलिः लीला यस्य तेन, गाधिसुतेन = विश्वामित्रेण, पूर्वं = ब्रह्मप्रार्थनात्पूर्वं सामि-घटिता = अर्धसृष्टा । 'सामि त्वर्द्धे जुगुप्सने' इत्यमरः। मुक्ता = पश्चान्मुक्ता, मन्दाकिनी नु = आकाशगङ्गा किम्, [ अनिलान्दोलैः ] अनिलस्य कर्तुरान्दोलनैश्चलनैर्दिवि = आकाशे, अखेलत् = विजहार, इत्युत्प्रेक्षा। एषा कथा त्रिशंकूपाख्याने द्रष्टव्या। शार्दूलविक्रीडितवृत्तम्। 'सूर्याश्वैर्मसजास्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्' इति लक्षणात् ॥१०२॥ उस नगरी के महल पर, लता के समान फहराती महीन रेशमी कपड़े की बनी हुई पताका-आँधी के झोंके के साथ-साथ-निरन्तर वेदपाठ से पवित्र हुई जिह्वा से निकले हुए, बहुत-से स्तोत्रों के पढ़ने में व्यस्त हुए, ब्रह्मा के चारो मुखों के द्वारा विघ्न पड़े हुए, और नये स्वर्गलोक के निर्माण करने की क्रीडा में पटु, गाधि-तनय विश्वामित्र के द्वारा, प्राचीन समय में, आधी बनी हुई और फिर बाद में (ब्रह्मा की प्रार्थना पर) परित्यक्त-मन्दाकिनी (स्वर्गगंगा) के समान, आकाश में अठखेलियाँ कर रही थी ॥१०२॥

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