भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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१२४ नैषधचरितम् । [ द्वितीयः = मेघम्, आरुह्य रसात् = रागाद् यान्ती = गच्छन्ती । अध्वनि अभ्रतरसा = मेघवेगेन हेतुना, निमेषं न प्राप । अत्र नगरामराङ्गनयोर्भेदेऽपि अनिमेषमेवारो- हणव्योमयानैः सैव इत्यभेदोक्तेरतिशयोक्तिभेदः । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ॥ १०४ ॥ अपने प्राण-नाथ के केलि-गृह के मध्य-देश का आतिथ्य ग्रहण करने के लिए उत्सुक (वहाँ गमन के निमित्त तैयार) - जलद (मेघ) पर अपने विलास-भवनों की अटारियों से चढ़ती हुई, उस नगर की रमणियाँ- विमान में बैठकर, आकाश- मार्ग से जाती हुई साक्षात् अप्सराएँ ही थीं; क्योंकि मेघ के वेग से आकाश में जाने में रस (अनुराग) के कारण उन की आँखें निमेष-हीन (पलक गिराने मात्र का भी विलम्ब सहन न करनेवाली; एक-टक ऊपर की ओर देखनेवाली) हो रही थीं ॥ १०४ ॥ वैदर्भी-केलि-शैले मरकत-शिखरादुत्थितैरंशुदर्भै- ब्रह्माण्ड।घात-भग्न-स्यदज-मदतया ह्रीधृतावाङ्मुखत्वैः । कस्या नोत्तानगाया दिवि सुर-सुरभेरास्यदेशागताग्रै- र्यद्द्रोग्रास-प्रदान-व्रत-सुकृतमविश्रान्तमुज्जृम्भते स्म ॥ १०५ ॥ वैदर्भीति । 'उत्ताना वै देवगवा वहन्ति' इति श्रुत्यर्थमाश्रित्याह-वैदर्भी- केलिशैले मरकतशिखरादुत्थितैः अथ [ब्रह्माण्ड।घात-भग्न-स्यदज-मदतया] ब्रह्माण्डाघातेन भग्नः स्यदजमदो वेगगर्वो येषां तत्तया, [ह्री-धृतावाङ्-मुखत्वैः] ह्रिया धृतं अवाङ्मुखत्वं यैस्तैरधोमुखैः । अत एव दिवि उत्तानगायाः = ऊर्ध्व- मुखाया इत्यर्थः । कस्याः सुरसुरभेः = देवगव्याः [आस्यदेशागताग्रैः] आस्यदेशं गताग्रैः [अंशुदर्भैः] अंशुभिरेव दर्भैः [यद् गोग्रास-प्रदान-व्रत-सुकृतं] यस्या नगर्याः सम्बन्धि गोग्रासप्रदानव्रतसुकृतम्, अविश्रान्तं प्रोज्जृम्भते स्म; किन्तु सर्वस्य अपि ग्रासदानाद्यत्तत्सुकृतमेवोज्जृम्भितमित्यर्थः । अत्युत्तमालङ्कारोऽयमिति केचित् । अंशुदर्भाणां ब्रह्माण्डाघाताद्यसम्बन्धेऽपि सम्बन्धोक्तेरतिशयोक्तिः भेदः । स्रग्धरावृत्तम् । 'म्रभौर्यानां त्रयेण त्रिमुनियुतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्' इति लक्षणात् ॥ विदर्भ-कन्या दमयन्ती के विहार-पर्वत पर, मरकत मणि की बनी हुई चोटी से, ऊपर की ओर किरणें जाती थीं; पर ब्रह्माण्ड के साथ टकराने से वेग का अहङ्कार चूर-चूर हो जाने के कारण, लज्जा के मारे नीचा मुँह करके लौटती थीं; और