भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः २ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १२५ आकाश में ऊपर की ओर मुंह करके जाती हुई, किसी देव-गाय के मुखमण्डल में दूब की नोंक की भांति प्राप्त होती थी। इस प्रकार उस नगरी में गो-ग्रास देने के व्रत का पुण्य — किरणरूपी दूब से — निरन्तर बढ़ रहा था ॥ १०५ ॥ विधु-कर-परिरम्भादात्तनिष्यन्दपूर्णैः शशि-दृषदुपक्लृप्तैरालबालैस्तरूणाम् । विफ़लित-जलसेक-प्रक्रियागौरवेण व्यरचि स हृतचित्तस्तत्र भैमीवनेन ॥ १०६ ॥ विध्विति । तत्र = तस्यां नगर्यां, शशिदृषदुपक्लृप्तैः=चन्द्रकान्तशिलावद्धैः, अत एव विधु-कर-परिरम्भात् = चन्द्रकिरणसम्पर्कात् हेतोः आत्तनिष्यन्दैः = जलप्रस्रवणैरेव पूर्णैस्तरूणाम्नालवालैः [ विफ़लित-जलसेक-प्रक्रियागौरवेण ] विफ़लितं व्यर्थीकृतं, जलसेकस्य प्रक्रियायां प्रकारे गौरवं भारो यस्य तेन, भैमीवनेन स= हंसो हृतचित्तो व्यरचि । कर्मणि लुङ् । अत्रालवालानां चन्द्रकान्तनिष्यन्दा- सम्बन्धेडपि सम्बन्धोक्तेरतिशयोक्तिभेदः । एतदारभ्य चतुःश्लोकपर्यन्तं मालिनीवृत्तम्। ‘ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः' इति लक्षणात् ॥ १०६॥ उस नगरी में चन्द्रकान्त मणि के बने हुए, पेड़ों के थाले — चन्द्रमा की किरणों के सम्पर्क से, अपने रिसते हुए जल से लबालब भरे हुए होकर,—पौधों को जल देकर, सींचने के कार्य-भार को व्यर्थ कर रहे थे। ऐसे भीमकुमारी दम- यन्ती के केलि-उपवन ने, उस राजहंस का चित्त, अपनी ओर आकृष्ट कर लिया ॥ अथ कनकपतत्त्रस्तत्र तां राजपुत्रीं सदसि सदृशभासां बिस्फुरन्तीं सखीनाम् । उडुपिरिषदि मध्यस्थायि-शीतांशु-लेखा- ऽनुकरण-पटु-लक्ष्मीमाक्षलक्षीचकार ॥ १०७ ॥ अथेति । अथ=दर्शनानन्तरं, कनकपतत्रः = स्वर्णपक्षी, तत्र = वने, सदृश- भासां = आत्मतुल्यलावण्यानां सखीनां सदसि विस्फुरन्तीं 'स्फुरति-स्फुलत्योर्निर्निविभ्यः' इति षत्वं उडुपिरिषदि = तारकासमाजे [मध्यस्थायि-शीतांशु-लेखा-ऽनु- करण-पटु-लक्ष्मीम् ] मध्यस्थायिन्याः शीतांशुलेखायाश्चन्द्रकलायाः, अनुकरणे पटु समर्था, लक्ष्मीः शोभा, यस्याः सा । इत्युपमालङ्कारः । तां राजपुत्रीं, अझिलक्षी- चकार = अद्राक्षीदित्यर्थः ॥ १०७॥