भारतकोश
नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

नैषधीयचरितम् (महाकवि श्रीहर्ष - बृहत्त्रयी महाकाव्य सटीक)

Naishadhiya Charitam of Sriharsha with Commentary

महाकवि श्रीहर्ष / पं. शिवदत्त शर्मा द्वारा

DevanagariSanskritpublished226 पृष्ठ

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सर्गः ३ ] जीवातु-मदयन्तिकासहितम् । १३३ Digitized by Sarayu Trust Foundation and eGangotri माधुः । पदे पदे तं = हंसं यथा। करप्राप्य = करग्राह्यं नूनं = निश्चितमवैति = अध्येति, तथा सखेल = सलीलं चलता = गच्छता, तेन = हंसेन प्रतार्य = वञ्च- यित्वा लतासु, आचकृषे = आकृष्टा, एकान्तं नीतेत्यर्थः ॥११॥ हंस पकड़ने की भावना वाली दमयन्ती — भावी प्रत्येक पग पर, उसे निश्चय ही अपने हाथ में, आया समझती थी ( कि अब की पकड़ लूंगी, पर पकड़ नहीं पाती थी ), इस प्रकार खेल के साथ चलता हुआ वह हंस कृशाङ्गी दमयन्ती को, चकमा देकर, लताओं के बीच ले गया ॥ ११ ॥ रुषा निषिद्धाळिजनां यदैनां छायाद्वितीयां कलयाञ्चकार । तदा श्रमाम्भःकणभूषिताङ्गीं स कीरवन्मानुषवागवादीत् ॥१२॥ रुपेति । रुषा निषिद्धाळिजनां = निवारितसखीजनां, एनां यदा [ छाया- द्वितीयां ] च्छाया एव द्वितीया यस्यास्तामेकाकिनीं, कळयांचकार = विवेद; तदा श्रमाम्भःकणभूषिताङ्गीं = स्वेदाम्बुलवपरिष्कृतशरीरां स्विन्नगात्रां तां स = हंसः कीरवत् = शुकवत् [ मानुषवाक् ] मनुष्यस्येव वाग्यस्य स सन् अवादीत् ।१२। रुष्ट होकर, जिसने अपनी सखियों को साथ आने से मना कर दिया था, अपनी परछाईं के अतिरिक्त जिसके साथ और कोई दूसरी सहेली नहीं थी एवं परिश्रम के कारण जिसके अङ्ग पर पसीने की बूँदें झलक रही थीं—ऐसी दमयन्ती से हंस, तोते की तरह, मनुष्य की बोली, बोलने लगा—॥१२॥ अये ! कियद्यावदुपैषि दूरं व्यर्थं परिश्राम्यसि वा किमर्थम् । उदेति ते भीरपि किन्नु बाले ! विलोकयन्त्या न घना वनालीः ॥१३॥ अय इति । अये ! बाले ! व्यर्थं कियद्दूरं यावदुपैषि = उपैष्यसि ? 'यावत्पुरानिपातयोर्लट्' । किमर्थं परिश्राम्यसि वा ? घनाः = सान्द्राः, बनाळीः = वनपंक्तीः विलोकयन्त्यास्ते भीरपि नोदेति किन्नु ? ॥१३॥ अरी ! कितनी दूरतक पीछा करती रहोगी ? ऐसा व्यर्थ परिश्रम क्यों कर रही हो ? अरी बाले ! वनों की इस घनी कतार को देखकर भी, क्या तुम्हें डर नहीं लग रहा है ? ॥१३॥ वृथार्पयन्तीमपथे पदं त्वां मरुल्ललत्पल्लवपाणिकम्पैः । आळीव पश्य प्रतिषेधतीदं कपोतहुङ्कारगिरा वनाळिः ॥१४॥ CC-0. Prof. Satya Vrat Shastri Collection, New Delhi. वृथेति । वृथा =व्यर्थमेव । न पन्था अपथम् । 'नञ्' इत्यादिना समासान्तः

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